उसका सुख—चैन क्यों लूटा जा रहा है। खाली एक सिलेण्डर से नागरिकों की जीवन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती। उस खाली सिलेण्डर को एक समयान्तराल के बाद उसमें गैस भरवाने और उस गैस पर कुछ पकाने का सामान भी चाहिए जिसके लिए धन की आवश्यकता ही होगी, जो मुश्किलों के बाद भी प्राप्त करना मुश्किल है।
बहुतों के यहॉं आॅल-आउट की मशीन है, लेकिन मच्छर ना काटे, इसके लिए 45 दिन तक चलने का दावा करने वाली कम्पनी का रिफिल भी चाहिए, जो आता तो 65 रूपये का है लेकिन मुश्किल से बीस दिन भी नहीं चलता है। हम उस देश में रह रहे हैं, जहॉं की ग्रामीण जनता के पास एक माह के लिए 500 रूपये का नोट भी बहुत बड़ी नियामत है।
मूल विषय पर आता हूॅं। यदि ईवीएम से ही भाजपा निकाय चुनाव जीत रही थी तो जहॉं बैलेट पेपर से मतदान हुआ, वहॉं पिछड़ क्यों गई? इतना सब तब हुआ जब उत्तर प्रदेश चुनाव आयोग की वेबसाइट पर चुनावी नतीजों का सारा ब्यौरा अपलोड था।
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