पंचतंत्र

PanchTantra-कान भरने की कला भाग-15

पिछले अंक के भाग-14 में आपने पढ़ा कि……………

उन्हें यह पता ही नहीं चल रहा था कि विष्णुशर्मा कहानियों के मधु में ज्ञान नामक गुडुची का सत भी मिलाते जा रहे हैं जिसे अलग से चखने पर उन्हें पहले उबकाई आने लगती थी।

इससे आगे भाग-15 में पढ़िए………कि..

इसलिए इसमें संदेह ही नहीं था कि वह उन्हें बहुत जल्द ही सही रहा पर ला देगा। और ऐसी सभी बातें सिखा देगा जिन्हें एक राजा को तो जानना ही चाहिए, जिसे दुनियाभर के आदमी को भी समझना चाहिए।

 यह भी पढ़ें:— PanchTantra-कान भरने की कला  http://northindiastatesman.com/panchtantra-9/
उसके सुझाव पर गौर करने के बाद राजा को आशा की एक नई किरण दिखाई दी। उसने विष्णुशर्मा को बुलावा भेजा और उनसे बोला, यदि आप मेरे इन लड़कों को जल्द अर्थशास्त्र में दूसरों जैसा समझदार बना सकें तो मैं आप को पांच सौ गांव दान में दूंगा।

विष्णुशर्मा बहुत पहुंचे हुए पंडि़त थे ही, वह उतने ही अक्खड़ भी थे। उन्होंने राजा से कहा, महाराज मेरी बात सुनें। मैं विद्या की बिक्री नहीं करता, फिर भी यदि छह महीने के भीतर आपके लड़कों को राजनीतिशास्त्र का ज्ञान न करा दूं तो अपना नाम बदल दूंगा।

अपने मुंह से अपनी तरीफ क्या करूं, पर मैं यह बात डंके की चोट पर कहता हूं कि मुझे धन-दौलत का लोभ नहीं। अस्सी साल की तो मेरी उमर हो गई। मेरी सारी इंद्रिया भोग विषयों से उदासीन हो चुकी हैं। इसीलिए, न धन की कोई लालसा है और ना ही जरूरत।

किंतु आपने जो इच्छा प्रकट की है उसे पूरा करने के लिए मैं खेल-खेल में शिक्षा देने का एक प्रयोग करूंगा। आज की तिथि कहीं लिख लीजिए। यदि आज से छह महाने के भीतर आप के लड़कों को राजनीतिशास्त्र में बेजोड़ न बना दिया तो आप मेरे साथ जैसा चाहें वैसा व्यवहार कीजिएगा।

राजा सनाका खा गया। जो काम कोई दूसरा शिक्षक पिछले दस पंद्रह वर्ष में नहीं कर सका उसे कर दिखाने का वचन ही एक हैरानी की बात थी। यह बूढ़ा पंडित इसे छह महीने में ही पूरा करने की बात कर रहा था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था। उसके मंत्रियों के अचरज का भी ठिकाना नहीं था। राजा अपने लड़कों को उस ब्राह्मण को सौंप कर इस ओर से पूरी तरह निश्चित हो गया।………………..इससे आगे भाग-16 में पढ़िए…

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