Shankardev
Shankardev

Shankardev-महान विभूति के भाग-2  में आपने पढ़ा कि…..

भक्ति के आचार्यों एवं कबीर आदि संतों से मिलने से उनके भक्त और कवि को नई दिशा प्राप्त हुई। तीर्थाटन से लौटकर Shankardev ने नव वैष्णव धर्म का प्रचार किया। Shankardev ने बरदोवा में प्रथम वैष्णव मठ की स्थापना की। जिसको असम में सत्र कहा जाता है।

इसे भी पढ़ें:   http://northindiastatesman.com/shrimanta-shankardev-2/

अब इसके आगे पढ़िए, भाग-3…………

बरदोवा में राजा एवं प्रजा के विरोध के कारण उन्हें बरपेटा कामरुप में जाकर नया सत्र स्थापित करना पड़ा। बरपेटा उस समय कोचबिहार राज्य में था। महापुरुष Shankardev ने समाजिक जीवन में सनातन सत्य के प्रित चेतना का संचार किया।

कर्म-धर्म में बलि एवं अनेक देवताओं की पूजा के भय का निवारण किया। Shankardev ने बाह्य आडंबर के स्थान पर आंतरिक शुद्घि की तथा सामाजिक समानता की शिक्षा दी। Shankardev का दर्शन शुष्क तर्क प्रधान नहीं है। उनकी भक्ति का मूल आधार है, भागवत, जिसमें कृष्ण को ब्रह्म के रुप में स्वीकार किया गया है।

Shankardev ने कृष्ण के लोक-कल्याणकारी, भक्त भयहारी, असुर निधनकारी स्वरुप का चित्रण किया है। उन्होंने आत्म शुद्घि का सरल और उत्तम उपाय नाम कीर्तन बताया है। जिसके द्वारा चित्त का परिष्कार और उदात्त भावना का विकास होता है।

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