manipur-rular-Garibnawaj-alias-Gopal-Singh-estate
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पिछले अंक के पार्ट-1 में आपने पढ़ा……..

पेना या एकतारा पर गानेवाला व्यक्ति नरक में जाएगा। इस राजाज्ञा के फलस्वरूप मणिपुर (Manipur) लोकगीतों के गान की प्रथा समाप्त हो गई, वह शताब्दियों के बाद वर्तमान युग में पुनर्जीवित हुई।

अब इससे आगे पढ़िए...पार्ट-2………….

गंगा-स्नान एवं प्रायश्चित की परंपरा भी महाराजा गरीबनवाज के समय में प्रारंभ हुई। उनके शासन-काल में गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का वर्चस्व स्थापित हो गया, किंतु उसे दो पक्षों से विरोध का सामना करना पड़ा-एक तो रामानन्दी एवं निम्बार्क आदि संप्रदायों के द्वारा और दूसरा स्थानीय मैत धर्म के कट्टर समर्थकों द्वारा।

इस कड़े विरोध के उपरांत भी चैतन्य संप्रदाय की प्रभुता मणिपुर (Manipur) में स्थापित हो ही गई। यह प्रभाव यहां के जन-जीवन पर आज भी बना हुआ है। बीसवीं शताब्दी में महाराज चूड़ाचांद सिंह के समय में मणिपुरी (Manipur) भाषा में गीत गाने की स्वंतत्रता फिर से दी गई।

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