myanmar-GaribNawaj
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पिछले अंक के पार्ट-2 में आपने पढ़ा……..

इनके शासनकाल में विभिन्न वैष्णव-संप्रदायों के धर्मप्रचारकों के आने तथा उनको प्रभावित करने के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। इस संबंध में विवाद भी है, किंतु इतना सत्य है कि इनके शासन-काल में ही वैष्णव धर्म राज्यधर्म को घोषित किया गया।

वैष्णव धार्मिक ग्रंथों एवं गायन-परंपरा का प्रचलन भी इसी समय हुआ और उसे लोकप्रियता प्राप्त हुई। इनके द्वारा निर्मित मंदिर एवं परंपराएं अब भी उनके वैष्णव भक्त होने के प्रमाण के रूप में बच रही हैं, अन्य साक्ष्य कालकवलित हो चुके हैं।

अब इससे आगे पढ़िए...पार्ट-3………….

इनकी मृत्यु के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। ऊपर कहा जा चुका है कि इनके धार्मिक विचारों का विरोध जनता तथा सामंतों द्वारा किया गया था। अजितशाह नामक उनका पुत्र विद्रोही बन गया था। जब गरीबनवाज (GaribNawaj) म्यांमार से लौट रहे थे तो अजितशाह के आदमियों ने माडलूं नदी के किनारे ज्येष्ठ पुत्र शामशाह, कुछ दरबारियों और शान्तिदास व उनके १७ शिष्यों की हत्या कर दी।

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