दूसरी सबसे बड़ी बात यह भी है कि जिस कांग्रेस के पास अपने कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों को देने के लिए पैसे नहीं थे, उसके पास चुनावों के लिए धन कहां से आ गया? हम यह भी जानते हैं कि देश ही नहीं, बल्कि विदेश में भी कई संस्थाएं ऐसी हैं जो नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक प्रभाव को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं।
हो सकता है कि कांग्रेस को ऐसे ही लोगों ने धन उपलब्ध कराया हो, लेकिन हम तो यही कहेंगे कि यह सारा मामला जांच ऐजेंसियों का विषय होना चाहिए। इसका आंकलन भी जांच एजेंसियां ही करें तो अच्छा रहेगा। लेकिन मेरे अल्प ज्ञान के मुताबिक भी यह गंभीर जांच का विषय तो बनता ही है।
दोनों राज्यों के चुनाव परिणाम कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए अपशकुन ही कहे जायेंगे। क्योंकि उनके अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद ही उनकी ऐसी परीक्षा हुई कि दोनों राज्यों में वे असफल हो गए। अध्यक्ष बनते ही दो-दो राज्य परिणामों में पराजय मिलना, अध्यक्षी की मीठी खुशी में कुनैन की कड़वाहट पैदा कर गई।
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