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साहूकारों और बैंकों की दु​रभिसन्धि तो नहीं

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थानाध्यक्ष से नीचे के पुलिस वालों को भी ये बैंकें सरकारी हों या प्राइवेट पतली गली का राश्ता दिखाने से नहीं चूकती हैं। कमोबेश यही हाल लोअर कोर्ट के वकीलों और पत्रकारों का भी है। लेकिन वक्त पड़ने पर इन बैंकों की खिदमत में ये सारे के सारे कुछ टुकड़ों के लिए इन बैंकों का बड़ी मुस्तैदी से अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए तैनात रहते हैं। नोटबन्दी के दौरान आपने बैंक वालों और बैंकों की ईमानदारी के किस्से पढ़े ही होंगे। कितनी ही बैंकें और उनके कर्मचारी अभी भी जाॅंच के घेरे में हैं। पढ़िये इससे आगे……………….

भारत की निम्न आय वर्ग वाली जनता अपनी अस्सी प्रतिशत आर्थिक जरूरतों की पूर्ति के लिए इन्हीं खूनचूसू साहूकारों पर ही निर्भर करती है। जबकि मात्र एक प्रतिशत मामलों में ही उन्हें वाणिज्यिक बैंकों से कर्ज मिल पाता है। दस प्रतिशत मामलों में उनके रिश्तेदार-दोस्त-यार, साहूकारों से कम दर पर और बैंको से अधिक ब्याज पर कर्ज दे देते हैं।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ही सरकारी कर्मचारियों को इन बैंकों से कर्ज नहीं मिल पाता, जिसका परिणाम यह है कि नब्बे प्रतिशत सरकारी कर्मचारी, साहूकारों के चंगुल में फंसे हुए हैं। जिनमें रेलवे में कार्य करने वाले लोगों की परसेन्टेज सबसे अधिक है।
ये साहूकार दस से पन्द्रह प्रतिशत प्रतिमाह का ब्याज वसूलते हैं और आश्चर्य की बात तो यह है कि कर्ज देते समय ही ये अपना,एक माह बाद उत्पन्न होने वाले ब्याज को पहले ही काटकर बाकी का पैसा कर्जदार को देते हैं। इसमें किसी भी प्रकार की लिखा-पढ़ी की आवश्यकता नहीं होती है। इन साहूकारों के अपने लठैत होते हैं जो रिकवरी का कार्य करते हैं, और इन लठैतों की सुरक्षा के लिए तो अपना पुलिस विभाग है ही!
फिर चाहे ये पुलिस, रेलवे की हो अथवा सिविल की। कोई फर्क पड़ने वाली बात नहीं है। भारत में तकरीबन 25 करोड़ कामगार, कम आय वाले वर्ग में हैं जिन्हें प्रतिदिन 80 रुपये से कम की मजदूरी मिलती है। इसका 80 प्रतिशत यानी 20 करोड़ कामगार 20 रुपये से भी कम प्रतिदिन पाते हैं, जिनमें 5 रुपया प्रतिदिन पाने वालों की संख्या भी 5 करोड़ के पार है।……….…………….जारी

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