यह एक विडम्बना ही है कि भारतीय जेलों में बंद कैदियों की संख्या का एक बड़ा हिस्सा उन कैदियों का है, जो सिर्फ इस कारण सलाखों के पीछे हैं, क्योंकि वे अदालतों द्वारा निर्धारित जमानत की राशि का बॉण्ड भरने में सक्षम नहीं हैं। उनके अपराध की प्रकृति उन्हें समाज में वापस जाने की अनुमति देने के साथ ही उन्हें अपराध साबित होने तक अदालत सामान्य जीवन-बसर करने की इजाजत देती है।
Bail Bond
लेकिन वे कभी इस योग्य हो ही नहीं पाते कि अदालत द्वारा निर्धारित जमानत की राशि, बॉण्ड के रूप में जमा करा सकें। नतीजतन वर्षों से सलाखों के पीछे वे अपने बेगुनाह होने का इंतजार ही करते रहते हैं। जबकि अमीर व सुविधा संपन्न व्यक्ति बड़े से बड़ा गुनाह करने के बाद भी बडे आराम से खुले में विचरण करता नजर आता है।
ऐसा ही किस्सा बताया दिल्ली स्थित तिहाड़ जेल में बन्द रहे 2-जी स्पैक्ट्रम के आरोपी भारत के पूर्व केन्द्रीयमंत्री ए.राजा ने। उन्होंने ने बताया कि उन्हें जेल में एक ऐसा कैदी मिला जो पिछले कई सालों से मात्र 20 हजार रुपये बॉण्ड के लिए न हो पाने के कारण जेल से मुक्त नहीं हो पा रहा था।
राजा ने जब सुना कि उसकी प्रजा मात्र 20 हजार रुपये के अभाव के कारण जेल में बन्द है तो उनका दिल पसीज गया और उन्होंने बीस हजार रुपये उस कैदी को दिये, और सच मानिए वह कैदी उन रुपये से बॉण्ड भरकर जेल से मुक्ति पा गया। इसका सबाब भी ए.राजा को ऊपर वाला ने दिया और वे मुक्ति पा गये।

सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे ही मामलों को देखकर एक समय कहा था कि हमारे मुल्क में जमानत का प्रचलित तरीका गरीबों को सताने और उनके प्रति भेदभाव करने वाला है। क्योंकि गरीब अपनी गरीबी के कारण जमानतराशि जुटाने के काबिल ही नहीं है। इसी पर उसने एक आदेश में कहा था कि अदालतें यह भूल जाती हैं कि गरीब व अमीर को जमानत देने में उनकी हैसियत का कितना बडा रोल होता है।
इन दोनों को जमानत के मामले में बराबर समझकर अदालतें गरीब व अमीर में असमानता ही पैदा नहीं कर रही हैं अपितु गरीबों के साथ एक तरह से भेदभाव और अन्याय भी कर रही हैं। अदालतों को चाहिए कि वे सिर्फ मुजरिम के जुर्म की संगीनता के आधार पर कोई फैसला नहीं सुनायें। वे अभियुक्त की माली हालत और उसके नाम को ध्यान में रखकर भी अपना निर्णय दें।
वहीं पुलिस को जमानतियों के साथ बॉण्ड भरने पर रिहाई मंजूर करने के घिसे-पिटे तरीके को छोड़ देना चाहिए। उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि अभियुक्त समाज से जुड़ा व्यक्ति है, उसके भाग जाने का कोई खास खतरा नहीं है। उसे चाहिए कि वह गरीब लोगों को निजी बॉण्ड पर, बिना रुपए-पैसे की देनदारी पैदा किये रिहा कर दे। इससे गरीबों में कानून के प्रति न सिर्फ सम्मान बढ़ेगा बल्कि वे छोटे-मोटे अपराधों में भगोड़ा होने से भी बच जाऐंगे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कोई पालन आजतक होता नहीं दिखाई दिया।
गौरतलब है कि सीआरपीसी संशोधन-2005 में भगोड़ों के लिए अलग से मामला चलाये जाने का प्राविधान लाया गया है, क्योंकि यह देखा गया है कि अक्सर व्यक्ति सजा व जेल से बचने के लिए भाग जाता है। ऐसे मामले ज्यादातर गरीब व सुविधाविहीन लोगों में पाये गये हैं। सुविधा सम्पन्न पैसों के बल पर अग्रिम जमानत ले लेते हैं, वह भी बडे आराम से। वहीं गरीबों में इस बात का भय होता है कि पुलिस उसे पकड कर जेल में बन्द कर देगी।

क्योंकि वह अग्रिम जमानत नहीं ले सकता। वह जानता है कि पुलिस के हत्थे चढ़ने के बाद मुकदमे का निर्णय आने तक वह जेल से बाहर नहीं आ सकता। इसीलिए वह भाग जाता है। यदि अदालत उन्हें सरकारी वकील दे देती हैं। और वह उनकी जमानत करवा भी देता है, तो भी वे जमानत के पैसे एकत्र करने में सक्षम नहीं हो पाते हैं। वहीं दूसरी ओर उनके जेल चले जाने से उनका पूरा परिवार दाने-दाने को मोहताज हो तितर-बितर हो जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि भगोड़ों के खिलाफ कठोर कार्यवाही करने से कुछ खास फर्क नहीं पड़ेगा। हाँ, यदि गरीबों में यह विश्वास पैदा कर दिया जाए कि अदालत उनमें और अमीरों में कोई भेदभाव नहीं करेंगी तो स्थिति में कुछ सुधार संभव है। विधि विशेषज्ञों ने भारतीय दंड संहिता व आपराधिक प्रक्रिया दंड संहिता में इस बात का खास ख्याल रखा था। भारतीय दंड संहिता पाठ 33 की धारा-436 से 450 तक जमानत से संबंधित है।
इसमें जमानत के उद्देश्य से लेकर अपराध की प्रकृति के अनुरूप आरोपी को मिलने वाले लाभ की चर्चा की गई है। इसके अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को उस पर मुकदमे का फैसला होने तक कानूनी हिरासत से रिहा करने को जमानत कहते हैं। इसके लिए आरोपी को अदालत में एक अर्जी लगाकर गुहार लगानी पड़ती है। धारा-437(1) व 439(1) में कहा गया है कि जमानत की अर्जी पर अदालतें अपनी सूझ-बूझ पर फैसला देंगी।
इसके तहत न्यायाधीष को परिस्थितियों का अध्ययन करना चाहिए जिसके कारण अपराध हुआ है। आरोपी के भागने की संभावना का ध्यान रखना चाहिए। साक्ष्य को प्रभावित करने की संभावना, मुकदमे का इतिहास एवं जांच पड़ताल की गति का अध्ययन करना चाहिए। यदि अपराध की प्रकृति धारा-437(2) के अनुरूप हैं तो उसे विशेष शर्तों पर रिहा किया जा सकता है।
यह शर्त पासपोर्ट जमा करना, अदालत की इजाजत के बिना भारत से बाहर नहीं जानां और साक्ष्य को प्रभावित नहीं करना हो सकता है। वहीं धारा-442 के तहत जज, अभियुक्त की रिहाई का आदेश जारी कर सकता है। जमानती मुचलके की स्थिति में अभियुक्त द्वारा पेश जमानती को अदालत मानने से कभी इंकार नहीं कर सकती, बशर्ते जमानती की आयु 18 वर्ष से ऊपर हो, उसके पास स्थायी पते का साक्ष्य हो और वह सभी कर्जों को चुकाने के बाद जमानत की राशि चुका पाने के योग्य हो।
साथ ही कानून में इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि यदि कोई आरोपी जमानत लेने के बाद अदालत द्वारा लगाई पाबंदियों को तोड़ता है तो उसका बेल बॅाण्ड जब्त किया जा सकता है। धारा-446 के तहत उसे अदालत जुर्माना भरने को कह सकती है। धारा-446(3) के तहत अदालत जुर्माने की रकम को कम कर सकती है या उसे किस्तों में बांट सकती है। आरोपी से मतभेद होने पर जमानती, धारा-444(1) के तहत जमानती बॉण्ड वापस लेने की अर्जी दे सकता है।
ऐसी स्थिति में अदालत धारा-444(2) के तहत आरोपी को सम्मन कर सकती है और गिरफ्तारी का आदेश भी दे सकती है। या धारा-446(क) के तहत नए जमानती से बॉण्ड भरवाया जा सकता है। यह अदालत के अपने विवेक पर निर्भर करता है कि वह अभियुक्त के साथ कैसा बरताव करती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में इस बात को इंगित भी किया है कि उस वक्त तक कानून अपने आप में पर्याप्त नहीं है जब तक कि उसे लागू करने वाला अपने विवेक का समुचित प्रयोग न करे।
उनके अनुसार कानून के महत्व को जोखिम में डाले बगैर जमानत के तरीके में मुकम्मल सुधार होना चाहिए ताकि गरीब के लिए भी यह मुमकिन हो सके कि वह मुकदमा शुरू होने से पहले अमीरों की तरह आसानी से रिहाई हासिल कर सके और भगोड़ा न बने।

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