धोखा-धड़ी
PNB का महाघोटाला:सरकारें बनीं भक्षक की रक्षक
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आखिरकार ऐसी अण्डरटेकिंग को काउन्टर चेक या कन्फर्म करने की व्यवस्था क्यों नहीं है? जिस तरह बैंक ड्राफ्ट जारी किये जाते हैं, वही प्रक्रिया लेटर आॅफ क्रेडिट जारी करने के लिए क्यों नहीं अपनाई जाती? बाकायदा लिखित रूप से उसके सत्यापन की व्यवस्था बैंकों ने इसीलिए नहीं रखी है कि लम्बा फ्राड किया जा सके।

PNB से हासिल इस LOU के आधार पर ही यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, एक्सिस बैंक आदि ने हीरा कंपनियों को कर्ज दिया। लेकिन पकड़े जाने से बचने के लिए पीएनबी के कर्मचारी बैंक के रजिस्टर में LOU को दर्ज ही नहीं करते थे।
मात्र इतनी से व्यवस्था से बैंकिंग हो रही है कि रजिस्टर में दर्ज किया तो ठीक वरना तो मौजा ही मौजा है। खातेदार के पैसों से मौज करते ये बैंक वाले क्या कभी सुधेरेंगे भी?
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