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दरअसल यही है सारी समस्याओं की जड़। Nationalised Banks फ्राड कराती हैं, उसमें हिस्सेदारी रखती हैं, और NPA होने पर सरकार उन्हें उसकी पूर्ति जनता के खून-पसीने की कमाई में से डण्डे के बल पर वसूले गये टैक्स से करती है। कितना अच्छा धन्धा है, तथाकथित उद्योगपतियों/कारोबारियों-Nationalised Banks और सरकार का।

npa & rbi
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बगैर सरकार की मर्जी के कोई कैसे देश का हजारों करोड़ लेकर विदेश भाग सकता है। अपने गुरूर में सुब्रतो राय सहारा विदेश नहीं भागा तो देखिए बगैर किसी सजा के जेल में भी रहा। और पैरोल पर छूटने के बाद मौज भी कर रहा है।

क्या बला है एलओयू अथवा एलसी:

  • एलओयू एक Nationalised Banks शाखा द्वारा दूसरी Nationalised Bank की शाखा को जारी किया जाता है। इसके दम पर विदेशी शाखाएं खरीददार को क्रेडिट की सुविधा उपलब्ध करा देती हैं। और इसमें लिमिट का भी ध्यान नहीं रखा जाता है। इस मामले में विदेश में स्थित Nationalised Bank शाखाएं भी जांच के घेरे में आ सकती हैं।

  • यही Nationalised Banks जब कमजोर आदमी को कर्ज देती हैं तो यदि एक लाख का कर्ज देती हैं तो उससे दस लाख की प्रोपर्टी बन्धक करा लेती हैं। तब कहीं मुश्किल से लोन देती हैं। लेकिन बड़े कहे जाने वाले फ्राड लोगों को हजारों करोड़ के लोन/क्रेडिट सैकण्डों में उपलब्ध करा देती हैं।

  • आखिरकार ऐसे LOU पर Nationalised Banks के प्रबन्ध निदेशक के हस्ताक्षर क्यों नहीं होते? एक ब्रान्च का मैनेजर किसी भी दूसरी ब्रान्च के मैनेजर को एलओयू जारी कर दे तो क्या बगैर किसी और बड़े अधिकारी से कन्फर्म किये इतनी बड़ी धनराशि किसी खातेदार को उपतब्ध कराई जा सकती है?

  • किन ब्रान्चों के पास हजारों करोड़ रहते हैं जो किेसी को उपलब्ध करा दे। क्या विदेशों में स्थित बैंक ब्रान्च करोड़ों-अरबों का धन अपने पास रखती हैं? ऐसा सम्भव ही नहीं कि इस घोटाले में Nationalised Bank पीएनबी का बड़ा अधिकारी सम्मलित ना हो।

  • वर्तमान एमडी सम्मलित नहीं हैं, हो सकता है। लेकिन 2011 वाला एमडी सम्मलित नहीं है, हो नहीं सकता।

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