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सूर्य के उत्तरायण होने का दिन है मकर संक्रांति, भगवान श्रीकृष्ण ने बताया उत्तरायण का महत्व

भारत ऐसा देश है जहां हर त्योहार को मनाने के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक या आध्यात्मिक कारण रहता है। किसी ना किसी रूप में मकर संक्रांति का पर्व भी पूरे देश में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मकर संक्रांति का त्योहार संक्रमणकालीन चरण माना जाता है।

जिस समय पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती है उस अवधि को सौर वर्ष कहते हैं। पृथ्वी का गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना क्रांतिचक्र कहलाता है। इस परिधि चक्र को बांटकर बारह राशियां बनी हैं। बारह महीने बारह राशियों के लिए हैं। मकर का अर्थ है मकर राशि और संक्रांति का अर्थ है संक्रमण।

सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना ”संक्रांति ” कहलाता है और सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को मकर संक्रांति कहते हैं। सूर्य के सभी संक्रमणों में से यह संक्रमण जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना ‘उत्तरायण ‘ तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना ‘दक्षिणायण ‘ है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं तथा रातें छोटी होने लगती हैं। दक्षिणायण में ठीक इसके विपरीत होता है।

शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन और दक्षिणायण देवताओं की रात होती है। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान और दक्षिणायण को पितृयान कहा जाता था।

मकर संक्रांति के दिन यज्ञ में दिए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएं शरीर छोड़कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसलिए यह आलोक का अवसर भी माना जाता है।

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