
एनालिसिस
साहूकारों और बैंकों की दुरभिसन्धि तो नहीं
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ये बैंकें विजय माल्या जैसों को लोन देने के लिए तत्पर रहते हैं। उनसे इनको लोन देने पर भी मोटी रकम बतौर नजराना प्राप्त होती है। ऐसे उद्योगपतियों की प्रोजेक्ट कास्ट को कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। उस पर ही बडी-बडी बैंकें लोन भी पास कर देती हैं। क्योंकि उसमें बैंकों को भी एक ही ग्राहक से करोड़ों रुपये सुविधा शुल्क के नाम पर प्राप्त हो जाते हैं।
उसे प्रति ग्राहक साढ़े सात हजार की दर से रिश्वत एकत्र नहीं करनी पड़ती है। बड़ी प्रोजेक्ट पास करने पर इन ओद्योगिक घरानों से दोस्ती होती है अलग से, जिसका फायदा ये बैंक वाले अपने किसी सगे सम्बन्धी को उस प्रोजेक्ट में अच्छी प्लेसमेन्ट दिलाकर प्राप्त कर लेते हैं।
यह देश अमीरों का है, गरीब तो उनके लिए एक रिसोर्स आइटम हैं। जिसका इस्तेमाल वह आउटसोर्स के रूप में भी कर लेता है। क्या भारतीय रिर्जव बैंक दावे के साथ कह सकता है कि उसने अपने उदभव काल से आजतक वाणिज्यिक बैंकों के फोकस में कभी निम्न आय वर्ग के लोगों को रखने का कोई नियम बनाया या सरकुलर जारी किया है? शायद नहीं।
यह तो बात रही निम्न आय वर्ग वालों की, जबकि सत्यता तो यह है कि मध्यम आय वर्ग के 80 प्रतिशत लोग भी इन बैंकों के ग्राहक जरूर हैं, लेकिन बैंकिंग के नाम पर वो केवल अपना पैसा जमा करने, उसे चेक के माध्यम से निकालने के अलावा और कुछ नहीं जानते। इसके लिए भी वे झिड़के जाते हैं अलग से। इसी को भारत की बैंकिंग समझ लीजिए वरना तो कर्ज पाने के लिए वे भी मारे-मारे घूमते हैं। ……………जारी
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