PanchTantra-कान भरने की कला भाग-12

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Panchtantra-12
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पिछले अंक के भाग-11 में आपने पढ़ा कि……………

वह कितना भी सुंदर हो, कितना भी कमाऊ निकले, कितना भी गुणी हो जाए, पर लड़का ज्ञानी नहीं हुआ तो उसका होना न होना बराबर है।

इससे आगे भाग-12 में पढ़िए………कि…..

सभासद कान खोले और ध्यान लगाए सुनते रहे। वे सभी जानते थे कि लड़के जन्म से ही लायक और नालायक होते हैं। वे यह भी मानते थे कि लड़की का जन्म मरी संतान से भी अधिक बुरा है। उन्हें पता था कि वंध्या स्त्री ही होती है पुरूष नहीं होता।

वे समझते थे कि विद्या का अर्थ पोथी पढऩा और पोथे रटना है। गुण और द्रव्यार्जन की क्षमता का इससे कुछ लेना देना नहीं है। इसलिए वे राजा से सहमति जताने के लिए लगातार सिर हिलाते जा रहे थे।

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राजा बोलता रहा, उस गाय को लेकर कोई क्या करेगा जो न बच्चा देती है न दूध। उस बच्चे को ले कर कोई क्या करेगा जो न विद्वान है न पितृभक्त।

कोडर्थ: पुत्रजातेन यो न विद्वान न भक्तिमान।

इतना ही क्यों, लड़के का मर जाना अच्छा है पर मूर्ख होना अच्छा नहीं। क्योंकि इससे मनुष्य विद्वानों के साथ उसी तरह मुंह दिखाने लायक नहीं रहता जैसे कलंकी लड़का किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहता। राजा की विद्वान होने की कसौटी भी कुछ कठिन थी।

इस पर कसने पर उसे मंत्रियों में से एक को छोड़ कर दूसरा कोई अपने को विद्वान सिद्ध ही नहीं कर सकता था। किसी दूसरे से पहले उसे और उसके दूसरे मंत्रियों को ही लाज से डूब मरना चाहिए था।

क्योंकि उसने कहा, गुणियों की गणना आरंभ होने पर जिसका नाम सबसे पहले नहीं लिया जाता, उसकी मां भी यदि पूतोंवाली है तो निपूती किसे कहेंगे।

मंत्रियों और सभासदों ने राजा का भाषण उतना ही ध्यान से सुना था जितने ध्यान से किसी राजा का भाषण सुना जाता है। इसका राजा पर अच्छा असर पड़ा और राजा सारी समस्या को सीधे उनके सामने रखने को तैयार हो गया।

उसने खांस कर गला साफ करते हुए कहा, यहां मेरे ही दान पर पलने वाले पांच सौ पंडित बैठे हैं। पंडितों ने इस कटु सत्य का बुरा नहीं माना। उसने आगे कुछ नरम होकर कहा, आप लोग कोई ऐसा जतन करें जिससे मेरे नालायक बच्चे कुछ पढ़ लिख जाएं।

……….इससे आगे भाग-13 में पढ़िए…