पंचतंत्र

PanchTantra की कहानी-King & Damanak भाग-17

Damanak ने सच्चे सेवक की सेवा शर्तों में यह भी जोड़ दिया कि उसे न तो काम के समय भूख लगनी चाहिए, न प्यास, न सर्दी, न गर्मी, न थकान, न नींद। भूख प्यास लागै नहीं नींद जाको आय। शीत ताप व्यापैं नहीं, वह सेवक फल पाय।

या तो वह इतने प्राचीन काल में ही रोबोट युग के सेवक की बात सोचने लगा था या एक ऐसे युग में अपनी शर्तें गिना रहा था जिसमें नौकरों-चाकरों को हाड़-मांस का रोबोट बना कर रखा जाता था।

Damanak कहने को ही सियार था, पर उसमें बहादुरी की कमी नहीं थी। अब वह बताने लगा कि राजा को युद्घ की तैयारी करते देख कर सच्चे सेवक का चेहरा खिल उठता है क्योंकि योग्य सेवक वही है जिसके पदासीन होने के बाद राज्य की सीमा शुक्लपक्ष के चांद की तरह बढ़ती चली जाती है।

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कुछ सेवक इसके उलट ऐसे भी होते हैं कि उनके पद संभालने के बाद राज्य की सीमा आग में पड़े चमड़े की तरह सिकुडऩे लगती है। राजा को ऐसे सेवकों को नौकरी से निकाल बाहर करना चाहिए।

फिर Damanak ने बताया कि सियार होते हुए भी वह इतना गया-बीता नहीं है कि राजा उसकी अनदेखी करे। उसने सबसे पते की बात यह कही कि महाराज बड़े लोग तो कहने को ही बड़े होते हैं। यदि छोटे लोग न रहें तो यह दुनिया एक दिन को भी चल न पाए।

Damanak ने बताया कि रेशम जैसा सुंदर धागा कीड़े तैयार करते हैं। सोना पत्थरों की खान से निकलता है। राजा का आसन याक ​अथवा सुरभी गाय के रोंए से बनता है। कमल कीचड़ में ही पैदा होता है।

Damanak ने बताया कि चंद्रमा समुद्र से निकला था, सभी जानते हैं। नीलकमल/मशरूम गोबर से पैदा होता है। आग, काठ से पैदा होती है। मणि भी सांप के फन से निकलती है। गोरोचन गोपित्त से बनता है, आदि—आदि।

Damanak ने बताया कि महाराज, योग्य लोग तो कहीं भी पैदा हों, अपनी योग्यता से दुनिया को यह बात और दिखा ही देते हैं कि वे क्या हैं।

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