damanak-panchatantra
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Damanak ने सच्चे सेवक की सेवा शर्तों में यह भी जोड़ दिया कि उसे न तो काम के समय भूख लगनी चाहिए, न प्यास, न सर्दी, न गर्मी, न थकान, न नींद। भूख प्यास लागै नहीं नींद जाको आय। शीत ताप व्यापैं नहीं, वह सेवक फल पाय।

या तो वह इतने प्राचीन काल में ही रोबोट युग के सेवक की बात सोचने लगा था या एक ऐसे युग में अपनी शर्तें गिना रहा था जिसमें नौकरों-चाकरों को हाड़-मांस का रोबोट बना कर रखा जाता था।

Damanak कहने को ही सियार था, पर उसमें बहादुरी की कमी नहीं थी। अब वह बताने लगा कि राजा को युद्घ की तैयारी करते देख कर सच्चे सेवक का चेहरा खिल उठता है क्योंकि योग्य सेवक वही है जिसके पदासीन होने के बाद राज्य की सीमा शुक्लपक्ष के चांद की तरह बढ़ती चली जाती है।

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