PanchTantra (पंचतंत्र) के एक पात्र का मानना है कि यदि किसी को मेहमान बना कर घर में घुसने दो तो वह घर के मालिक का ही पत्ता साफ करके उस पर कब्जा जमाने की कोशिश करता है। जैसे आप ट्रेन में सफर कर रहे हों, और अपनी बर्थ पर किसी को बैठने की जगह दे दें, तो धीरे-धीेरे वह व्यक्ति सरकता हुआ आपकी बर्थ ही घेरने लगता है।
और हालात यहां तक पहुंच जाते हैं कि वो आपको नीचे धकेल दे और स्वंय बर्थ पर काबिज हो जाये। जैसे इस कहानी में विष्णुशर्मा जी ने (काल्पनिक पात्र) मूल लेखक को ही नीचे धकेल दिया। इस एक वाक्य में लेखक की वेदना चेतावनी बन कर बाहर आ गई है। बेचारे ने विष्णुशर्मा को अपनी कहानी का प्रधानपात्र बना कर अपनी किताब में घुसने का मौका क्या दिया, शर्मा जी पूरी किताब पर पालथी मारकर बैठ गए। आज जिससे पूछो वही कहता है कि PanchTantra (पंचतंत्र) के लेखक विष्णुशर्मा हैं।
पर शर्मा जी की अपनी हालत भी कुछ अच्छी नहीं है। बेचारे, होने और न होने के बीच, त्रिशंकु की तरह शताब्दियों से लटके हुए हैं। जिसे देखो, शक की नजर से देख रहा है। यह तो उनका कलेजा है कि इस हालात में भी अपनी सीनाजोरी से बाज नहीं आ रहे हैं,”यदि मैं पंचतंत्र का लेखक विष्णुशर्मा न हुआ, और किसी लेखक का रचा हुआ पात्र ही हुआ। तो क्या! मेरे आगे PanchTantra (पंचतंत्र) के लेखक को कौन नहीं पूछेगा!
परेशानी यह है कि हम दावे के साथ यह भी नही कह सकते कि विष्णुशर्मा, पंचतंत्र के लेखक नहीं है।
पुराने लेखक कुछ तिकड़म भिड़ाकर अपनी प्रस्तावना में ही अपना नाम डाल दिया करते थे। PanchTantra (पंचतंत्र) के लेखक के साथ गड़बड यह है कि जिस महिलारोप्य नाम के नगर को उसने अपनी कहानी का केंद्र बनाया। वह अपने आप से इतना दूर है कि महिलारोप्य वाले स्वंय महिलारोप्य की कहानियां सुनते रहते हैं। संदेह होता है कि जब यह नगर ही काल्पनिक हैं। तो इसका राजा और इसमें रहने वाले विष्णुशर्मा काल्पनिक कैसे नहीं हुए। यही उनकी उम्र से भी लगता है। इतनी उम्र में किसी लेखक ने अपनी सर्वोत्कृष्ट रचना नहीं लिखी है, विश्व साहित्य की सर्वोत्कृष्ट रचनाओं की तो बात ही अलग है।
असल आदमी हो या कहानी का केंद्रीय पात्र, हमारे विष्णुशर्मा दोनों रूपों में जीवित हैं। उम्र लेखक की जो भी रही हो, हमारे लिए यह न तो अस्सी बरस से एक पल कम हैl न ही अस्सी बरस एक दिन अधिक। क्ल्पना कीजिए, अस्सी साल का एक बूढ़ा अपनी काया और परछाइयां लिए हुए हजारों वर्षों से अस्सी साल की उमर पर टंगा हुआ हैl
और अपना पोपला मुहं लिए दुनिया के लाखों करोड़ों लोगों को अपनी पोथी पढ़ते देख कर खुले हुए पन्ने की ओट से लगातार मुस्करा रहा हैंl हमारे दिमाग के उस कोने से, जहां उसकी इबारतों का अर्थ दर्ज होता है। और कह रहा है कि वह कहानीकार भी है, और कहानी का पात्र भी। वह है भी और नहीं भी है।
शर्मा जी अस्सी के हो गए हैं, पर तबीयत के खासे रंगीन हैं। इंद्रियों ने जवाब दे दिया है, जवानी की कोई लालसा बाकी नहीं रह गई है, पर जवानी के सारे कारनामे आखों के सामने हैं। बूढ़े आदमी की सारी इंद्रिया उसकी आंखों में और जुबान में सिमट आई हैं। हाथों में जुंबिश भले ही ना हो, लेकिन आंखों में दम बना हुआ है। जवानी में जो कुछ देखा, किया और सुना था, सब का सब आंखों के आगे है।

 

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