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PanchTantra की कहानी-बेकार का पचड़ा-भाग-10

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पंचतंत्र के बेकार का पचड़ा भाग-9 में आपने पढ़ा कि ……..

दमनक समझाता जा रहा था, जो व्यक्ति राजा को आफत में पड़ा देखकर भी उसकी अनसुनी नहीं करता है और उसके हुक्म पहले की तरह बिना किसी चूक और हीला-हवाली के बजाता रहता है, वही राजा का चहेता हो सकता है।

अब इससे आगे पढ़िए, भाग-10…………

साथ ही उसे राजा (King) के शत्रुओं को अपना शत्रु, उसके मित्रों को अपना मित्र भी समझना चाहिए। राजा (King) यदि खीझ उठे और कुछ उल्टा सीधा बक जाए तो भी योग्य सेवक को कभी उलट कर जवाब नहीं देना चाहिए। चूक राजा (King) से हुई हो तो भी उसे अपनी चूक मान लेना चाहिए। राजा (King) के सामने न तो उसे ऊंची आवाज में बोलना चाहिए, न ही ठहाका मार कर हंसना चाहिए।

राजा (King) वीरता की भी बहुत कद्र करते हैं। इसलिए योग्य सेवक युद्घ पर भेजे जाने पर डरता नहीं है। वह समझता है कि उसका तो जन्म ही इसीके लिए हुआ था। उसे राज्य के किसी काम से विदेश जाना पड़े तो उसे इस तरह स्वीकार करना चाहिए जैसे अरसे बाद उसे अपने घर जाने का मौका मिला हो। ऐसा सेवक ही राजा (King) का चहेता बन सकता है।

इस बात को फिर दुहरा दूं कि जो सेवक राजकुल की स्त्रियों के साथ किसी प्रकार का संबंध नही रखता, उनकी न तो निंदा करता है न ही उनके मुंह लगता है, वही राजा (King) को खुश रख सकता है। करटक को अब न तो दमनक की योग्यता पर अविश्वास रह गया था, न ही वह उसे इस विषय में कोई उपदेश देना चाहता था।

फिर भी यदि कहीं भी जाना हो तो कुछ तैयारी तो कर ही लेनी चाहिए। यह तो साफ होना ही चाहिए कि वह वहां जाकर अपनी बात किस तरह रखेगा। उसने यही बात दमनक से पूछी, यह बताओ वहां जा कर सबसे पहले तुम कहोगे क्या?

दमनक ने कहा, भाई, जैसे बरसात अच्छी हो तो बीज से अंकुर अपने आप निकल आता है। उसी तरह बातचीत के समय सवाल में से ही जवाब और जवाब में से ही सवाल निकलते जाते हैं। इसके लिए पहले से इतनी तैयारी की क्या आवश्यकता है। इसलिए मैं पहले से ही न तो कुछ सोच और गढ़ कर जाऊंगा, न ही बिना उचित प्रंसग आए अपनी बात कहूंगा।

पिता के संपर्क में रह कर जो कुछ मैंने सीखा है उसका एक भेद यही है कि जो बिना अवसर के ही कोई बात कह बैठता है वह यदि बृहस्पति की तरह परम विद्वान हो तो भी उसका अपमान होकर ही रहता है।

इसके आगे भाग—11 में पढ़ियेग़ा……….

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