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PanchTantra की कहानी-King-Pinglak भाग-14

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पंचतंत्र के बेकार का पचड़ा भाग-13 में आपने पढ़ा कि ……..

कहा तो यह भी गया है कि चाहे King कितने भी संपन्न हो, कितना भी कुलीन हो और चाहे उसे King का पद अपनी वंश-परंपरा से ही क्यों न मिला हो, यदि King गुण की परख नहीं कर पाता है या जानते हुए उसकी अनदेखी करता है तो उसका साथ उसके सेवक भी नहीं देते हैं। जब तक साथ रहते भी हैं तो मनमानी करते रहते हैं।

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अब इससे आगे पढ़िए, भाग-14 …………

इतना ही नहीं, जो King गुणी व्यक्तियों में भी यह अंतर नहीं कर पाता कि कौन कितने पानी में है और किसको कितना ऊंचा पद मिलना चाहिए, जो समान गुण वाले सेवकों के साथ समान व्यवहार नहीं कर पाता या जो योग्य व्यक्तियों की तुलना अयोग्य व्यक्तियों से करता रहता है उसके सेवक भी उसको छोड़ कर चल देते हैं।

दमनक कहने लगा यदि आप जानना चाहें कि ऐसा होता क्यों है तो इसे समझना कठिन नहीं है। वे ऐसे स्वामी को मूर्ख या सिरफिरा समझने लगते हैं। उन्हें उसके अधीन काम करने में अपमान सा लगता है। इसमें दोष सेवक का नहीं, King का होता है।

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कहते हैं कि मणि सोने में जडऩे के लिए होती है। उसे कोई रांगे में जड़े तो वह तो कुछ न कहेगी पर उसकी चमक गायब हो जाएगी। देखने वाले इसके लिए मणि में खोट नहीं निकालेंगे। वे इस मूर्खता के लिए जौहरी की ही निंदा करेगे।

दमनक ने बिना किसी हिचक के कहा, महाराज को तो इस बात की शिकायत है कि मैं इतने समय तक दिखाई ही नहीं पड़ा, पर आया क्यों नहीं, यह तो महाराज को सोचना चाहिए था। उसने बिना किसी घबराहट या डर के कहा, कारण वही है जिसकी चर्चा अभी कर रहा था।

यदि King ही दाएं और बाएं हाथ का फर्क नहीं समझेगा तो उसके अधीन कौन समझदार आदमी रहना पसंद करेगा? जो King कांच को ही मणि समझ कर गले लगाता हो और मणि को कांच समझ कर फेंक देता हो, उसके आश्रय में कोई योग्य सेवक एक क्षण को भी ठहर सकता है, भला?

दमनक देख रहा था कि उससे कुछ बेअदबी हो रही है पर इस समय उसकी बात का असर हो रहा था। बात सूक्तियों के बहाने कही जा रही थी। King पिंगलक इसकी काट करता या इस पर चिढ़ता तो इससे उसकी मूर्खता साबित हो जाती।

इसके आगे भाग—15 में पढ़ियेग़ा……….

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