फ्लैश न्यूजसाइबर संवाद

जेनुइन पत्रकार अपने बच्चों को पत्रकारिता में लाना नहीं चाहते

इसीलिए अपने बच्चों को पत्रकारिता में लाना नहीं चाहते जेनुइन पत्रकार….!!!
अपने पेशे के प्रति ईमानदार पत्रकारों और उनकी पत्रकारिता के सामने आर्थिक चुनौतियां वाकई इतनी विकट हो गयी हैं कि लोग इस पेशे से ही पलायन करने लगे हैं।
अपवाद के तौर पर चुनिंदा करोड़पति अरबपति पत्रकारों को छोड़ दें (हालांकि अब इन करोड़पतियों अरबपतियों को पेशे से पत्रकार कहना उचित नहीं होगा) तो कमोबेश बाकी सब अपनी आर्थिक चुनौतियों से जूझ ही रहे हैं।
जो आज पत्रकारिता के नाम पर कारपोरेट मीडिया में चकाचक नौकरी भी कर रहें हैं, उन पर भी भविष्य की अनिश्चितता की तलवार हमेशा लटकी ही रहती है। कौन कब सड़क पर आ जाए कोई भरोसा नहीं।
यही वजह है कि आज जिन पत्रकारों ने अपनी पूरी जवानी पत्रकारिता में खपा दी उनमें से अपवादों को छोड़ कर शायद ही कोई अपने बच्चों को पत्रकारिता के पेशे में लाया है।
यहां तक कि हमलोग अपने परिवार या आसपास के क़रीबी बच्चों द्वारा पत्रकारिता में करियर को लेकर पूछे गये सवालों पर सिरे से मना कर देते हैं कि कुछ भी कर लो लेकिन पत्रकारिता मत करना। एक अन्य वजह पत्रकारों की सामाजिक मान्यता पर उठे सवाल भी हैं।
एक समय था कि विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और अन्य समाज के तौर पर पत्रकारों को उनके काम से खासा सम्मान मिला करता था मगर आज जिसे बात करने की तमीज नहीं वो तपाक से मूंह खोलकर पत्रकारों को दलाल कहने से नहीं चूकता।
सोचना तो बनता है कि लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभों में नेता अपने बच्चों को राजनीति में प्रमोट करता है और ये बच्चे नेता बनते भी हैं। अधिकारी अपने बच्चों को सिविल सेवा में प्रमोट करता है और ये बच्चे अधिकारी बनते भी हैं।
जज अपने बच्चों को जूडिशियरी में प्रमोट करता है और ये बच्चे जज/ सरकारी वकील बनते भी हैं मगर क्या कारण है कि कथित चौथा खंभा यानि एक जेनुइन पत्रकार न तो अपनों बच्चों को पत्रकारिता के लिए प्रमोट करता है और न ही उनके बच्चे पत्रकार बनते हैं।
वजह है….. करियर को लेकर अनिश्चितता, सच लिखने पर नौकरी और प्राण हमेशा खतरे में, पारिवारिक सामाजिक जीवन तनावपूर्ण और जीवन भर की आर्थिक चुनौतियां हमेशा मूंह बाये खड़ी रहती हैं।
लोकतंत्र के तीनों खंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के लोगों के वेतन भत्ते और पेंशन आदि की सुविधा जनता के‌ टैक्स के पैसों से हो जाती है तो उनके सामने आर्थिक चुनौतियां नहीं आतीं मगर पत्रकारिता को बचाए रखने के लिए पत्रकारों को आर्थिक जरूरतों की पूर्ति के‌ लिए कारपोरेट मीडिया के वेतन पर अथवा सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर रहना पड़ता है।
कारपोरेट कहता है कि नौकरी करो पत्रकारिता नहीं अन्यथा वेतन नहीं मिलेगा जबकि सरकार कहती है कि चापलूसी करो पत्रकारिता नहीं अन्यथा विज्ञापन नहीं मिलेगा।
ऐसे में पत्रकारिता छोड़कर कोई गैर पत्रकारीय धंधा पानी शुरू करने में और स्वाभिमान पूर्वक अपना जीवन जीने में कोई बुराई नहीं, इसलिए इस फोटो में चित्रित विषय पर मेरी पूरी सहानुभूति है।
मगर याद रहे कि जेनुइन पत्रकारों का पत्रकारिता से पलायन लोकतंत्र के हित में नहीं है देश के हित में नहीं है….. मैंने तो गुबार निकाल दिया जो पढ़ रहे हैं वो इस बारे में सोचें जरूर……
#बाबाकीजयहो #नवयोग #नये_युग_का_आरंभ
राजीव तिवारी “‘बाबा”
वरिष्ठ पत्रकार

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जिसका प्रत्येक लेख बहस का मुद्दा है.

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