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PanchTantra की कहानी-बेकार का पचड़ा-भाग-12

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पंचतंत्र के बेकार का पचड़ा भाग-11 में आपने पढ़ा कि ……..

राजा (King)का पद उसी तरह दुर्लभ है जैसे ब्रह्मतेज की प्राप्ति। ब्रह्मत्व की साधना और राजसत्ता की प्रितस्पर्धा में तनिक भी चूक होने पर सब कुछ गड़बड़ हो जाता है। और इनमें एक और समानता होती है कि ये दोनो ही तनिक भी उपेक्षा सहन नहीं कर पाते।

अब इससे आगे पढ़िए, भाग-12 …………

राजलक्ष्मी की भी कुछ अलग महिमा है। जलघड़ी के जल की तरह राजलक्ष्मी अपने आप पर ही रीझी रहती है। इसे पाना कठिन तो होता ही है इसको संभाल कर रखना भी बहुत कठिन होता है। लाख जतन करने पर भी इसे रोक कर नहीं रखा जा सकता।

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दमनक अभी तक चुपचाप सुन रहा था। करटक की बात पूरी होने पर उसने कहा, तुम्हारी बात ठीक है। किसी भी वस्तु का जो स्वभाव है उसको समझ कर ही उसके साथ व्यवहार किया जा सकता है। यदि स्वभाव समझ में आ गया तो व्यक्ति किसी को भी अपने अनुकूल बना सकता है।

और फिर सेवक की तो सबसे बड़ी विशेषता ही यह है कि वह स्वामी के मनोनुकूल आचरण करे। ऐसा करके ही वह राजा (King) को प्रसन्न कर सकता है।

राजा (King) को मुट्ठी में करना है तो वह रुठ जाए तो उसको मनाओ और उसकी खुशामद करो, जो उसके चहेते हों उसको पटाओ, जिनसे उसकी अनबन है उनसे कटो और दानवीरता की प्रशंसा करो। उसे (King) वश में करने का इससे बड़ कर कोई दूसरा मंत्र नहीं है।

अब करटक की सारी दुविधा मिट गई थी। उसने कहा, यदि ऐसा है तो तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो। अब जो भी समझ में आए, करो। मेरी एक ही बात गांठ बांधे रहना, राजा (King) के यहां पहुंच कर कभी असावधान मत रहना क्योंकि तुम्हारे भले बुरे पर ही मेरा भविष्य भी टिका हुआ है।

जब करटक ने भी हामी भर दी, दमनक उसे प्रणाम करके पिंगलक की ओर चला। दमनक को अपनी ओर आते देख कर पिंगलक ने द्वारपाल को आदेश दिया, मेरे पुराने मंत्री के पुत्र दमनक आ रहे हैं। इनके आने पर किसी तरह की रोक-टोक नहीं होनी चाहिए, इसलिए अपनी बेंत की छड़ी पीछे हटा लो। उन्हें दूसरी पंक्ति में बैठना होगा।

इसके आगे भाग—13 में पढ़ियेग़ा……….

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