जो सत्ताविहीन है और जनता-जनार्दन की परिभाषा से गर्वन होता है, उसी को न्याय की दरकार है, जो किस तरह मिलता है, उससे अच्छा कौन जान सकता है। उसी के नाम पर और कल्याण के लिए बने ये संवैधानिक संस्थान मजे कर रहे हैं।
न्याय और जन कल्याण के नाम पर गठित संस्थान आम जनता को कुछ भी मुहैय्या नहीं करा रहे सिवाय दुख,तकलीफ और गरीबी के। 90 प्रतिशत लोगों को अपना गुलाम बनाने के लिए रची गई इसक व्यवस्था को मजबूत स्थिति में रखने के लिए वे हर लुभावने नारे, नियम और निर्णय का सहारा लेते हैं।
यदि इसमें कोई कमी रह जाती है तो संविधान में संशोधन कर उसकी पूर्ति करते हुए कामयाबी की ओर बढ़ते हैं।
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