महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव (Shrimanta Shankardev) सन 1449-1568 ई० में मुसलमानों के आक्रमण से पूर्व ही असम में भक्ति भावना पनप गई थी। भारत में प्रचारित भक्ति भावना से प्रभावित होकर असम में भी भक्ति का प्रचार-प्रसार हुआ। आठवीं से बाहरवीं शताब्दी तक संपूर्ण असम में तंत्र-मंत्र का प्रभाव रहा।

देवी मंदिरों में नर बलि की प्रथा भी प्रचलित थी। धर्म के नाम पर अंधविश्वास एवं व्यभिचार का प्राबल्य था। जब-जब धर्म की हानि होती है, अराजकता की स्थिति होती है। धर्म के नाम पर अधर्म होता है।
उस समय पृथ्वी पर किसी महापुरुष का आगमन होता है। जो धर्म को पुर्नप्रतिष्ठित करता है। तथा दिग्भ्रमित मानव को सही दिशा दिखलाता है। अत्याचार एवं अन्याय को मिटाता है।
मध्यकाल में पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में असम में अराजकता की स्थिति थी। पशु-पक्षी, बलि की प्रथा अपने चरम पर थी। अहोम राजा एवं उसके दरबारी सब शाक्त थे। अत: बलि प्रथा प्रचलित थी। …………Contd.
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