जितनी पीड़ा मुझे गरीबों, मजदूरों की बेबसी को लिपिबद्ध करने में नहीं हुई उससे ज्यादा जख्म ये प्रतिक्रियाएं दे रही थीं। अभी उनकी प्रतिक्रिया से आहत ही था कि दूसरे अग्रज की प्रतिक्रिया आ गई। वह तो सरकार के पक्ष में खड़े होकर दलीलें लिखने लगे। कभी बेबाक लेखनी आज सरकार को खुश करने में लगी थी। हर सवाल पर बचाव की दलीलें।
पटरी से कटने पर संवेदना व्यक्त करने के बजाय उन्हीं मजदूरों को दोषी ठहराने में लगे थे। सरकार के इतने कसीदे तो शायद उनके प्रवक्ता भी न काढ़ पाएं जितने अग्रज ने समर्थन में कलम तोड़ दी थी। पार्टी विशेष के प्रति आग्रह का आभास तो मुझे था पर यह अंधभक्ति में कब बदल गया, इसका एहसास प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद हुआ। उनके संदेश से आहत था तो उस संदेश पर प्रतिक्रिया देने में असमर्थ।
कारण वरिष्ठता का सम्मान। अपनत्व का एहसास। मर्यादा का ख्याल। रिश्ते न बिगड़ने का मलाल। बहुत देर तक सोचता रहा। मन मंथन करता रहा। चिंतन से चिंता बढ़ती जा रही थी। मन बेचैन और स्वर खामोश थे। आखिर कब तक अंतर्द्वंद्व करता। अन्ततः मैंने पोस्ट डिलीट कर दी। मगर जमीर सोने नहीं दे रहा था और चित्त व्यग्र था। क्या लिखूं, किसके लिए।
बेशक उन मजदूरों से मेरा कोई रिश्ता नहीं था। पर उनकी बेबसी ने मेरी बेचैनी बढ़ा दी थी। एक तरफ पोस्ट डिलीट करने के लिए खुद को माफ नहीं कर पा रहा था तो दूसरी ओर बने-बनाये रिश्ते को तोड़ना नहीं चाहता था। पर यह प्रतिक्रियाएं जीवन भर मुझे सालती रहेंगी।
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