हर मोड़ पर हारा सर्वहारा
सर्वहारा की पीड़ा को शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है। हर कदम पर ठोकर, हर मोड़ पर दुत्कार। बेबस और लाचार। उनके अक्स की यह बानगी भर है। संवेदना के बोल उनमें स्फूर्ति भर देते हैं। वह सरकार बनाते हैं पर सरकार के लिए वह एक वोट से बढ़कर कुछ नहीं।
अब तो सरकार ने लेबर एक्ट पर शिकंजा कसके उन्हें शोषण के लिए मजबूर कर दिया है। पहले से ही हालात का मारा सर्वहारा आज बेबसी से संघर्ष कर रहा है। उसकी अपनी पहचान तो मिट गई। अब परिवार को संभालने में कमर टूट रही है।
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