उत्तर प्रदेश

प्रमुख सचिव और निदेशक में ‘लेटर वार’ शुरू, पढ़ें क्या लिखा है पत्र में

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लखनऊ : समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों और प्रमुख सचिव के बीच विवाद बढ़ता जा रहा है. शासन से जारी पत्र में प्रमुख सचिव समाज कल्याण ने निदेशक बालकृष्ण त्रिपाठी से जवाब तलब किया है. निदेशक पर वित्तीय अनियमितताओं, लापरवाही और अनुशासनहीनता का आरोप लगाया गया है. इस मामले में प्रमुख सचिव समाज कल्याण बीएल मीणा ने निदेशक से 16 गंभीर आरोपों पर स्पष्टीकरण मांगा है. प्रमुख सचिव ने 10 पन्नों का पत्र भेजकर निदेशक को स्पष्टीकरण के लिए कहा है. इस मामले पर निदेशक बालकृष्ण त्रिपाठी से बात करने की कोशिश की गई तो उनका फोन नहीं उठा.

इन बिंदुओं पर मांगा जवाब

पत्र में कहा गया है कि निदेशक ने हाईकोर्ट में विचाराधीन एक मामले में समय से प्रति शपथ पत्र नहीं लगाया. अंतर विभागीय परामर्श से संबंधित समस्त मामले ऑफिस प्रणाली के माध्यम से संचालित किए जाने के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन समस्त पत्रावलियां ऑफलाइन प्रस्तुत की जा रही हैं. भारत सरकार की गाइडलाइन के अंतर्गत सभी प्रस्ताव ऑनलाइन भारत सरकार को भेजे जाने के निर्देश हैं, लेकिन एनजीओ के सभी प्रस्ताव ऑफलाइन प्रेषित किए गए हैं. निर्गत स्वीकृति के संबंध में निदेशक के स्तर पर उक्त शासनादेश का परीक्षण न करके उसमें हुई त्रुटि का निराकरण किए जाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है. न ही तत्समय स्थिति से शासन को अवगत कराया गया है. इस संबंध में निदेशक से पूर्व में स्पष्टीकरण मांगा गया था, लेकिन निदेशक ने अभी तक स्पष्टीकरण नहीं दिया है. यह कृत्य सरकारी आचरण नियमावली के प्रावधानों का उल्लंघन है.

‘विभाग और शासन की छवि हुई धूमिल’

पत्र में कहा गया है कि अति पिछड़ी अनुसूचित जाति समूह बहुल गांव में सर्वागीण विकास के लिए संचालित एकीकृत विकास योजनाओं के तहत स्वीकृति संबंधी शासनादेश में खामियां थी. आदेश के बावजूद इन्हें नहीं सुधारा गया. इस प्रकरण में विभिन्न जिलों के 50 विकास कार्यों के लिए दूसरी किस्त के रूप में 1237.212 लाख की वित्तीय स्वीकृति दी गई थी. पत्र में लिखा है कि महिला और बाल विकास संयुक्त समिति से संबंधित बैठक में उठाए गए बिंदुओं पर निदेशक ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया है. उत्तर मांगने पर विभागीय अधिकारियों को साथ लेकर निदेशक कक्ष के बाहर चले गए थे. बाद में मीडिया के सामने प्रमुख सचिव के खिलाफ बयानबाजी और नारेबाजी कराई गई. इससे विभाग और शासन की छवि धूमिल हुई है.

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