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राजर्षि भाग्यचन्द्रसिंह- पार्ट-2

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गतांक पार्ट-1 से आगे……..
उन्मत्त गज की ओर चिंथंखोम्बा एक हाथ में पुष्पाहार और दूसरे हाथ में जपमाला लिए आगे बढ़ रहे थे। एक बार मत्त गयंद राजा की ओर लपका और लोगों ने सोचा कि अब तो महाराज को गज कुचल देगा। किंतु ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि हाथी पर भगवान श्रीकृष्ण कुशल महावत के रूप में सवार थे।
उन्होंने हाथी को दूसरी ओर मोड़ दिया। चिंथंखोम्बा के अतिरिक्त किसी ने भी भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं किए। अपने त्रिभंगी रूप में भगवान हाथी पर खड़े मुरली बजा रहे थे, अतः चिंथंखोम्बा हाथी के निकट पहुंचे पर हाथी ने उन्हें अपनी सूंड से उठाकर अपने उपर बिठा लिया। हाथी पर पहुंचते ही महाराज ने श्रीकृष्ण को पुष्पाहार अर्पित किया।
उसी दिन से उन्हें भाग्यचन्द्र जयसिंह कर्ता के नाम से जाना जाने लगा। महाराज स्वर्गदेव ने महाराज भाग्यचन्द्र को सेना आदि की अपेक्षित सहायता दी। परिणाम स्वरूप भाग्यचन्द्र महारज पुनः मणिपुर के सिंहासन पर आरूढ़ हुए। इसके बाद वे श्री गोविन्द जी द्वारा असम में दी गई आज्ञा को भूल गए।
एक दिन अचानक कैना नामक पर्वत से एक पर्वतीय महिला ने आकर महाराज भाग्यचन्द्र से कहा कि मुझे कैना पर्वत पर एक बालक मिला जिसने मुझसे कहा कि मैं तुम्हारे पास जाकर वचन का स्मरण करवाउं। महिला ने बाल कृष्ण का रूप वर्णन भी किया, जिसको सुनकर महाराज मूर्क्षित होकर गिर पड़े।
महाराज महिला के साथ निर्दिष्ट स्थान कैना पर गए, जहां महिला ने राजा को वह कटहल का वृक्ष दिखलाया जिससे विग्रह निर्माण होने थे। वृक्ष को निकाला गया और राजधानी लमाडदोड. विष्णुपुर लाया गया। वहां श्री सापम लक्ष्मणसिंह नामक एक मणिपुरी कलाकार को वृक्ष की लकड़ी से श्री गोविन्दजी की त्रिभंगी मूर्ति बनाने का आदेश दिया गया।
इससे आगे पार्ट-3 में…..

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