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चीन से बढ़ रहे प्रेशर को कब तक झेल पायेगा ताइवान? कब्जे के लिए शी जिनपिंग ने क्या बनाया है प्लान ?

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क्या हांगकांग के बाद अब ताइवान पर मंडरा रहा है संकट? चीन की बढ़ती चालबाजियों को कब तक झेल पायेगा ताइवान? ताइवान हिम्मत तो दिखा रहा है लेकिन क्या संकट गहराने पर दुनिया उसके साथ खड़ी होगी या चुपचाप तमाशा देखेगी? इन सब सवालों के जवाब आज की रिपोर्ट में ढूँढ़ने की कोशिश करेंगे और बताएंगे कि क्यों ताइवान को चीन के साथ मिलाने के लिए कोई भी कदम उठाने को तैयार हैं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग।

इस समय क्या माहौल है?
इस समय की बात करें तो चीन के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर ताइवान को परेशान करने के लिए रिकॉर्ड संख्या में सैन्य विमान भेजने के बाद बीजिंग ने धमकाने वाली अपनी कार्रवाइयों में भले कमी कर दी है लेकिन तनाव अब भी कम नहीं हुआ है। चीन अपने इन सैन्य अभ्यासों को उचित ठहराने की कोशिशें लगातार कर रहा है। इस समय जो हालात दिख रहे हैं उसके मुताबिक सीधे संघर्ष होने की आशंका फिलहाल नजर नहीं आ रही है, लेकिन स्वशासित ताइवान के भविष्य को लेकर स्थिति कभी भी खतरनाक बन सकती है।

विवाद का इतिहास क्या है?
दरअसल, चीन रणनीतिक और प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण ताइवान को फिर से अपने नियंत्रण में लेना चाहता है और अमेरिका ताइवान के मामले को चीन की ओर से बढ़ती चुनौतियों के संदर्भ में देखता है। हम आपको बता दें कि ताइवान खुद को एक संप्रभु राष्ट्र मानता है लेकिन चीन इस पर अपना दावा करता है। चीन, ताइवान के अपना क्षेत्र होने का दावा करता है जबकि यह द्वीप 1949 में गृहयुद्ध के दौरान कम्युनिस्ट शासित मुख्य भूमि से अलग होने के बाद से स्वायत्तशासी है। चीन और ताइवान की शासन पद्धति में भी अंतर है। चीन में एक दलीय शासन प्रणाली है जबकि ताइवान में बहुदलीय लोकतंत्र है।

क्यों आतुर हैं शी जिनपिंग?
देखा जाये तो ताइवान पर कब्जा करना चीन की राजनीतिक और सैन्य सोच का हिस्सा है। शी जिनपिंग ने साल 2012 में राष्ट्रपति बनने के बाद चीन के कायाकल्प का काम शुरू किया तथा चीन के मुख्य हिस्से में ताइवान को जोड़ना उनके मुख्य लक्ष्यों में से एक है। चीनी राष्ट्रपति शी ने ताइवान और चीन के पुन: एकीकरण की जोरदार वकालत करते हुए पिछले सप्ताह ही कहा था कि ‘ताइवान का मुद्दा’ सुलझाया जाएगा और ‘शांतिपूर्ण एकीकरण’ दोनों पक्षों के हितों में है। शी ने यह भी साफ-साफ कहा था कि ताइवान के मुद्दे पर किसी भी तरह के ‘‘विदेशी हस्तक्षेप’’ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। चीन की बढ़ती आक्रामकता के मद्देनजर अमेरिका और जापान ताइवान के प्रति अपना समर्थन बढ़ा रहे हैं जिसकी पृष्ठभमि में चीनी राष्ट्रपति की यह टिप्पणी आई थी।

ताइवान को लेकर चीन-अमेरिका क्यों भिड़ जाते हैं?
हम आपको यह भी बता दें कि ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच टकराव की स्थिति 1996 में भी पैदा हुई थी। तब चीन ने ताइवान के लिए बढ़ते अमेरिकी सहयोग से नाराज होकर ताइवान के तट से करीब 30 किलोमीटर दूर जलक्षेत्र में मिसाइल प्रक्षेपण समेत सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया था। इसके जवाब में अमेरिका ने क्षेत्र में दो विमान वाहक पोत भेजे थे। उस समय चीन के पास विमान वाहक और अमेरिकी पोतों को धमकाने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे।

इसलिए वह पीछे हट गया था। इसके बाद चीन ने अपनी सेना को मजबूत बनाना शुरू किया और 25 साल बाद उसने मिसाइल सुरक्षा प्रणाली विकसित कर ली है, जो जवाबी हमला कर सकती है और उसने अपने विमान वाहक पोत भी बना लिए हैं। जहां तक बात चीन की ओर से अपने राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर ताइवान के दक्षिण पश्चिम में रिकॉर्ड 149 सैन्य विमान भेजे जाने की है तो इस पर अमेरिका समेत पूरी दुनिया की ओर से चिंता जताये जाने के बाद चीन ने कहा था कि सैन्य अभ्यासों और जंगी विमान संबंधी मिशन राष्ट्र की स्वायत्तता एवं क्षेत्र की रक्षा के लिए जरूरी थे।
ताइवान क्या चाहता है?

वहीं इन सब मुद्दों पर ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन ने कहा है कि देश की रक्षा के लिए हर उपाय किये जाएंगे। राष्ट्रीय दिवस पर आयोजित परेड में ताइवान की रक्षा क्षमता का प्रदर्शन किया गया और इस दौरान राष्ट्रपति साई इंग वेन ने चीनी सेना के बलप्रयोग को दृढ़ता से खारिज किया। राष्ट्रपति साई ने कहा कि हम यथास्थिति को एकतरफा रूप से बदलने से रोकने के लिए पूरी कोशिश करेंगे। उन्होंने कहा कि हम राष्ट्रीय रक्षा को बढ़ावा देते रहेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी ताइवान को चीन द्वारा निर्धारित मार्ग पर चलने के लिए मजबूर नहीं करे। हम अपना बचाव करने के लिए दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन करते रहेंगे।

ताइवान की राष्ट्रपति साई ने चीन के अधिनायकवादी और एकल पार्टी कम्युनिस्ट शासन प्रणाली के विपरीत ताइवान में जीवंत लोकतंत्र पर जोर देते हुए कहा है कि चीन ने जो रास्ता बनाया है, वह न तो ताइवान के लिए एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक जीवन शैली प्रदान करता है, न ही हमारे 2.3 करोड़ लोगों के लिए संप्रभुता प्रदान करता है। यही नहीं ताइवान में जो हालिया सर्वेक्षण हुआ है वह दर्शाता है कि अधिकतर ताइवानी स्वतंत्र राज्य की यथास्थिति कायम रखने के पक्ष में हैं और चीन द्वारा एकीकरण का पुरजोर विरोध करते हैं जबकि चीन का कहना है कि वह द्वीप पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए जरूरत पड़ी तो सैन्य बल का भी इस्तेमाल करेगा। चीन ने ताइवान को डराने के लिए पिछले साल सितंबर से लेकर अब तक 800 से अधिक बार अपने लड़ाकू विमानों को ताइवान की ओर उड़ाया है।

ताइवान की ताकत क्या है?
उधर, ताइवान संभावित खतरे के मद्देनजर जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों से अपने अनौपचारिक संबंधों को मजबूत कर रहा है। चीन अगर अपनी ताकत ताइवान को दिखा रहा है तो पलटवार में ताइवान ने भी अपने राष्ट्रीय दिवस पर मिसाइल लांचर, बख्तरबंद वाहनों सहित अपने हथियारों का प्रदर्शन किया जबकि लड़ाकू विमानों और हेलीकॉप्टर ने फ्लाइट पास्ट किया। इनमें एक एफ-16, स्वदेशी लड़ाकू विमान और मिराज 2000 शामिल थे। वायुसेना की ताकत का प्रदर्शन करने के बाद सीएम32 टैंक और उसके बाद ट्रकों में रखी मिसाइल प्रणाली प्रदर्शित की गई।

शी जिनपिंग का प्लान क्या है?
बहरहाल, जिस तरह चीनी राष्ट्रपति बनने के बाद से शी जिनपिंग ने विस्तारवाद अभियान को आगे बढ़ाने पर पूरा ध्यान लगाया है उससे आने वाले समय में ताइवान के लिए मुश्किलें हो सकती हैं। चीनी राष्ट्रपति ने कहा भी है कि ताइवन का प्रश्न चीनी राष्ट्र की कमजोरी और अराजक स्थिति की वजह से पैदा हुआ और इसे सुलझाया जाएगा ताकि एकीकरण वास्तविकता बन सके। शी का कहना है कि सभी चीनियों की यह इच्छा है कि ताइवान उसके साथ मिले। शी का यह भी कहना है कि ताइवान का प्रश्न चीन का आंतरिक मामला है और इसमें किसी विदेशी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। देखना होगा कि यदि ताइवान पर संकट आता है तो कौन-कौन उसकी मदद के लिए खड़ा होता है? यह सवाल इसलिए क्योंकि हांगकांग के लोकतंत्र पर चीनी अतिक्रमण के दौरान भी दुनिया एक तरह से खामोश ही रही।

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