panchtantra-king-3
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पंचतंत्र के बेकार का पचड़ा भाग-11 में आपने पढ़ा कि ……..

राजा (King)का पद उसी तरह दुर्लभ है जैसे ब्रह्मतेज की प्राप्ति। ब्रह्मत्व की साधना और राजसत्ता की प्रितस्पर्धा में तनिक भी चूक होने पर सब कुछ गड़बड़ हो जाता है। और इनमें एक और समानता होती है कि ये दोनो ही तनिक भी उपेक्षा सहन नहीं कर पाते।

अब इससे आगे पढ़िए, भाग-12 …………

राजलक्ष्मी की भी कुछ अलग महिमा है। जलघड़ी के जल की तरह राजलक्ष्मी अपने आप पर ही रीझी रहती है। इसे पाना कठिन तो होता ही है इसको संभाल कर रखना भी बहुत कठिन होता है। लाख जतन करने पर भी इसे रोक कर नहीं रखा जा सकता।

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दमनक अभी तक चुपचाप सुन रहा था। करटक की बात पूरी होने पर उसने कहा, तुम्हारी बात ठीक है। किसी भी वस्तु का जो स्वभाव है उसको समझ कर ही उसके साथ व्यवहार किया जा सकता है। यदि स्वभाव समझ में आ गया तो व्यक्ति किसी को भी अपने अनुकूल बना सकता है।

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