पंचतंत्र

PanchTantra की कहानी-बेकार का पचड़ा-भाग-8

पंचतंत्र के बेकार का पचड़ा भाग-7 में आपने पढ़ा कि ……..

जो कुछ उस समय मैंने सुना और जाना था उसका सारांश मैं तुम्हें बताता हूॅ। कम से कम इसे तो गांठ बांध ही लो। दमनक (Damanak) बोला, यह दुनिया ऐसी है जिसमें जिधर देखो, उधर सोने के फूल खिले हैं। पर तीन ही लोग हैं जो इन फूलों को चुन सकते हैं। ये हैं वीर पुरूष, विद्वान और सेवा-
टहल का मर्म जानने वाले।

अब इससे आगे पढ़िए, भाग-8…………

अब जैसी कि तुम्हारी आदत है, तुम पूछोगे कि सेवा कहते किसे हैं? तो यह समझ लो कि जिस काम से राजा (King) का हित होता है और विशेषत: जो काम राजा (King) करने को कहे, उसे करना ही सेवा है।

आज्ञापालन और जी-हुजूरी ही इसकी कसौटियां हैं। आम लोग तो ऐसा करते ही हैं पर विद्वान लोग जरा अकड़ में रहते हैं कि मुझे तो जो ठीक लगेगा वही कहूंगा, राजा (King) को अच्छा लगे या बुरा।

मैं कहता हूं कि विद्वानों को भी इसी उपाय से राजा का संरक्षण प्राप्त करना चाहिए। एक बात अवश्य है। ऐसे राजा (King) की सेवा करने का कोई लाभ नहीं है जो गुणग्राही न हो। वह ऊसर भूमि के समान है। उस पर कितना भी श्रम किया जाए उससे कुछ प्राप्त होने की आशा नहीं की जा सकती।

परंतु यदि राजा (King) गुणग्राही हो और वह निर्धन हो तो भी उसका आश्रय ग्रहण करना चाहिए। कारण जब उसके दिन फिरेंगे, तो वह सारी कमी पूरी कर देगा। हां, खरदिमाग राजा (King) का आश्रित होने से अच्छा कि व्यक्ति जहां है वहीं भूख और अभाव से ठूंठ की तरह सूख जाए।

यदि किसी सेवक को इस बात की समझ ही नहीं है कि किस राजा (King) की सेवा करनी चाहिए और किसकी नहीं तो उसे राजा को दोष नहीं देना चाहिए कि वंह सूम और रूखा है। किसी को दोष ही देना है तो अपने आप को देना चाहिए कि उसे सही आश्रयदाता का चुनाव करने की भी योग्यता नहीं।

जिस राजा (King) की सेवा करने के बाद भी आराम न मिले और हाय-हाय बनी ही रहे, उसके पास दौलत जितनी भी क्यों न हो, वह मदार के पौधे की तरह है, जिसके फूल से न तो सुगंध आती है न ही जिसका फल खाया जा सकता है।

दमनक ने अब हंसते हुए कहा, एक बात याद रखो। जो सेवक सोचता है कि राजा को रिझा लिया, अब किसी की चिंता नहीं, वह कभी भी धोखा खा सकता है। राजा (King) की मां, उसकी पत्नी, उसके पुत्र, मुख्यमंत्री, राजपुरोहित और द्वारपाल को भी राजा की तरह ही सम्मान देना चाहिए।

इसके आगे भाग—9 में पढ़ियेग़ा……….

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