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UP Congress : आराधना मिश्रा के सामने अजय राय की विरासत, 2027 से पहले संगठन को नई धार देने की चुनौती

उत्तर प्रदेश की चुनावी दहलीज पर कांग्रेस आलाकमान द्वारा आराधना मिश्रा ‘मोना’ को नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद, राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक नया विमर्श शुरू हो गया है। आने वाले दिनों में आराधना मिश्रा द्वारा उठाए जाने वाले हर कदम और उनके सांगठनिक फैसलों की सीधी तुलना पूर्व अध्यक्ष अजय राय के कार्यकाल से होनी तय है।

अजय राय ने अपने ढाई साल के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश के भीतर कांग्रेस संगठन को जिस आक्रामक तरीके से पुनर्जीवित किया और जमीनी स्तर पर जो रिकॉर्ड कायम किए, वे आराधना मिश्रा के सामने पहाड़ों जैसी चुनौतियां बनकर खड़े हो गए हैं।

अखिलेश यादव की तुलना में अधिक सक्रिय रहे अजय, आराधना को तोड़ना होगा रिकॉर्ड…

•    सड़कों पर आक्रामक संघर्ष: अजय राय के ढाई साल के कार्यकाल में यूपी कांग्रेस ने विभिन्न जनहित के मुद्दों को लेकर प्रदेशभर में 150 से अधिक छोटे-बड़े आंदोलन और प्रदर्शन किए, जिनमें खुद अजय राय कई बार जेल गए और लाठियां खाईं।

•    विशाल डिजिटल सदस्यता अभियान: अजय राय के नेतृत्व में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में एक व्यापक आउटरीच प्रोग्राम चलाया, जिसके तहत प्रदेश के सभी 75 जिलों में लगभग 12 लाख नए डिजिटल और सक्रिय कार्यकर्ताओं को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दिलाई गई।

•    अखिलेश यादव से अधिक जमीनी सक्रियता: लोकसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद भी, अजय राय सांगठनिक दौरों के मामले में सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव से भी आगे रहे। उन्होंने उत्तर प्रदेश के 75 जनपदों का सघन संगठनात्मक दौरा किया और हर जिले में कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद स्थापित किया, जिससे सुस्त पड़ी कांग्रेस में नई जान फूंकने का प्रयास किया।

आराधना मिश्रा के सामने खड़ी हैं बड़ी चुनौतियां

•    कार्यकर्ताओं के बीच ‘सड़क के नेता’ की छवि बनाना: अजय राय विशुद्ध रूप से एक मास लीडर (जमीनी नेता) हैं जो पुलिस से भिड़ने में संकोच नहीं करते। इसके विपरीत, आराधना मिश्रा की छवि एक विधायी और संसदीय नेता की रही है। कार्यकर्ताओं के बीच अजय राय जैसी आक्रामक स्वीकार्यता बनाना उनकी पहली परीक्षा होगी।

•    सपा से सीट शेयरिंग में कड़ा विनिमय: आगामी विधानसभा चुनाव और उप-चुनावों में कांग्रेस के लिए सम्मानजनक सीटें सुरक्षित करना सबसे बड़ी चुनौती है। अजय राय के दौर में कांग्रेस ने लोकसभा में 17 सीटों पर चुनाव लड़कर 6 सीटों पर जीत (करीब 35% सक्सेस रेट) दर्ज की थी। अब आराधना के सामने चुनौती है कि वे आगामी चुनावों में सपा के साथ मोलभाव कर कम से कम 80-90 विधानसभा सीटें कांग्रेस के पाले में लाएं।

•    नए सांगठनिक ढांचे में संतुलन: कांग्रेस ने इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष और देविंदर निषाद व आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया है। अजय राय के पुराने वफादार कार्यकर्ताओं और इस नए सोशल इंजीनियरिंग वाले नेतृत्व के बीच बिना किसी आंतरिक गुटबाजी के तालमेल बिठाना बेहद कठिन काम होगा।

क्या होगी आराधना की रणनीति; कैसे जीतेंगी चुनावी जंग?

अजय राय से बड़ी लकीर खींचने और आगामी चुनाव जीतने के लिए आराधना मिश्रा को अपनी रणनीतियों में बड़े और व्यावहारिक बदलाव करने होंगे:

•    सपा नेतृत्व से मधुर संबंधों का सीधा लाभ: आराधना मिश्रा और उनके पिता प्रमोद तिवारी के सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ बेहद करीबी और पुराने पारिवारिक संबंध हैं। अजय राय के समय जो सीट शेयरिंग में तीखापन आता था, आराधना उसे टेबल टॉक और मधुर संवाद के जरिए सुलझा सकती हैं, जिससे गठबंधन बिना किसी मनमुटाव के जमीन पर 100% वोट ट्रांसफर करा सके।

•    महिला वोट बैंक (आधी आबादी) को साधना: प्रियंका गांधी के दौर में यूपी की महिलाओं के बीच काम करने का आराधना को गहरा अनुभव है। वे प्रदेश की महिला मतदाताओं को सीधे ब्लॉक और बूथ स्तर पर जोड़कर कांग्रेस का एक स्वतंत्र ‘साइलेंट वोट बैंक’ खड़ा कर सकती हैं, जो अजय राय के दौर में नहीं हो सका था।

•    सोशल इंजीनियरिंग का प्रभावी क्रियान्वयन: आराधना (ब्राह्मण), इमरान मसूद (मुस्लिम), देविंदर निषाद (ओबीसी) और आलोक प्रसाद (दलित) का यह नया चतुष्कोणीय नेतृत्व अगर सामूहिक रूप से फील्ड में उतरा, तो यह सपा के पीडीए  के सामने कांग्रेस के पारंपरिक जनाधार को पूरी तरह वापस ला सकता है।

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