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शनि प्रदोष व्रत पर ऐसे करें भगवान शिव की पूजा, जानिए मुहूर्त और मंत्र

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हर महीने की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती के साथ न्याय और कर्म के देवता शनिदेव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। माना जाता है कि प्रदोष व्रत करने से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और शनि दोषों से मुक्ति मिलती है। साथ ही भगवान शिव और मां पार्वती की कृपा प्राप्त होती है। प्रदोष व्रत करने से जातक के जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। तो आइए जानते हैं शनि प्रदोष व्रत का शुभ मुहू्र्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में…

शुभ मुहूर्त
बता दें कि अक्तूबर के महीने में पहला प्रदोष व्रत 04 अक्तूबर शनिवार को पड़ रहा है। पंचांग के मुताबिक शाम 05:10 मिनट से त्रयोदशी तिथि लग जाएगी। जोकि अगले दिन यानी की 05 अक्तूबर की शाम 03:04 मिनट तक व्याप्त रहेगी। उदयातिथि के हिसाब से 04 अक्तूबर को शनि प्रदोष का व्रत किया जा रहा है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 06:10 मिनट से शाम 07:45 मिनट तक रहेगा।

पूजन विधि
प्रदोष व्रत की पूजा हमेशा प्रदोष काल यानी की सूर्यास्त के बाद की जाती है। इसलिए पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें और फिर साफ कपड़े पहनें। अब पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें और फिर हाथ में जल कर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान शिव का जल, गंगाजल या फिर पंचामृत से अभिषेक करें। फिर शिवलिंग को चंदन लगाएं और धतूरा, बिल्व पत्र, भांग और मदार के फूल आदि अर्पित करें।

फिर मां पार्वती और भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। इसके बाद धूप-दीप करें और शिव मंत्रों का रुद्राक्ष माला से जाप करें। प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें और पूजा के अंत में भगवान शिव और मां पार्वती की आरती करें। शिव पूजन के बाद पीपल के पेड़ के नीचे या फिर शनि मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाएं और शनिदेव को काले तिल और तेल चढ़ाएं।

मंत्र
ॐ नमः शिवाय।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

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