
Astrology में शनि क्यों है ‘मारकेशों का राजा’, जानें लघुपाराशरी का यह सबसे बड़ा सिद्धांत
लघुपाराशरी ज्योतिष का एक प्रमुख अंग है। यह विंशोत्तरी दशा के जरिए से फलादेश करने पर केंद्रित है। इसमें 42 सूत्रों में शुभ-अशुभ योगों, राजयोग, मारक ग्रहों के संयोग का सिद्धांत समझाता है। लघुपाराशरी के चतुर्थ आयुर्दायाध्याय के श्लोक 6 के मुताबिक, ‘मारकैः सह सम्बन्धान्निहन्ता पापकृच्छनिः। अतिक्रम्येतरान् सर्वान् भवत्येव न संशयः।।’ यानी की पापफल देने वाले शनि ग्रह का मारक ग्रहों के साथ संबंध होने पर यह अन्य मारक ग्रहों को लांघकर खुद ही मारक हो जाता है। इसमें किसी भी तरह का संदेह नहीं करना चाहिए।
यह लघुपाराशरी के चतुर्थ आयुर्दायाध्याय के श्लोक 6 का मत है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि पूर्व जन्म के कर्म के आधार पर कुंडली में शनि ग्रह पीड़ित होता है और ऐसा शनि व्यक्ति को दुख देने में तत्पर होता है। वहीं शनि ग्रह के विशेष मारक प्रभाव की वजह से कुछ ज्योतिष शनि को मारक ग्रहों में राजा भी कहते हैं।
लघुपाराशरी का सिद्धांत
लघुपाराशरी का सिद्धांत के अनुसार, अगर कुंडली में शनि ग्रह मारक है, तो अन्य मारक ग्रहों के विचार की जरूरत नहीं रहती है।
अगर कुंडली में शनि ग्रह मारकेशों से संबंध नहीं रखता है, तो ज्योतिषीय गणना के मुताबिक जो भी जन्मपत्री में प्रबलतम मारक ग्रह होता है, वही मरण देगा।
अगर कुंडली में शनि को कम डिग्री में भी मारकत्व प्राप्त हो, तब भी शनि ही मृत्यु देने वाला होगा। हालांकि तब यह संभव है कि जबकि शनि पापी हो और त्रिकोणेश या फिर केंद्रेश होकर अगर वह त्रिषडायेश होगा, तब भी यह पापी माना जाएगा।
अगर कुंडली में शनि सप्तमेश के साथ अष्टमेश होता है, तो वह स्वयं मारक होगा। इसमें किसी तरह का संदेह नहीं है। अगर कर्क लग्न की कुंडली में ऐसी स्थिति बनती है, जहां पर शनि सप्तमेश होकर अष्टमेश भी होता है, यहां पर शनि स्वयं पापी है, या मारकेश है या फिर मारक संबंधी है। ऐसे में यह निश्चय ही मारक होगा।
जब भी मारक का विचार किया जाए, तो पहले यह देखना चाहिए कि आयु काल के किस खण्ड तक है। सबसे पहले यह देखना चाहिए कि जातक की साधारण आयु किस श्रेणी में आ रही है।
तीन श्रेणी में देखी जाएगी आयु
बता दें कि ज्योतिष शास्त्र में आयु को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। जिसमें दीर्घायु, मध्यायु और अल्पायु है। ऐसे में सबसे पहले यह देखना चाहिए कि जातक की साधारण आयु किस श्रेणी तक है। फिर इसके बाद मारकेश का विचार करना चाहिए। मध्यायु या दीर्घायु की स्थिति में अगर मारकेशों की दशा आ जाती है, लेकिन तब भी मृत्यु नहीं होती है, तो इसका मतलब है कि जातक को मृत्युतुल्य कष्ट होगा। ऐसे में महामृत्युंजय जाप और कुंडली के हिसाब से उपाय करना चाहिए। इससे मारक दशा न्यूनतम कष्ट देकर बीत जाती है।



