पंचतंत्र

PanchTantra-कान भरने की कला भाग-16

पिछले अंक के भाग-15 में आपने पढ़ा कि……………

उसके मंत्रियों के अचरज का भी ठिकाना नहीं था। राजा अपने लड़कों को उस ब्राह्मण को सौंप कर इस ओर से पूरी तरह निश्चित हो गया।

इससे आगे भाग-16 में पढ़िए………कि..

न सही छह महीने साल दो साल ही सही, वह पंडित उसके लड़कों को कुछ कम नालायक तो बना कर ही रहेगा। विष्णुशर्मा ने मनुष्य के जीवन में और खास करके राजाओं के सामने आने वाले उलझन भरे सवालों और नाजुक मौकों का खाका तैयार कर उन मौकों पर राजनीति के पंडितों ने जो कुछ सुझाया था उसे बीच-बीच में नगीनों की तरह जड़ते हुए एक ऐसी कहानी लिख मारी जो खत्म होने पर आ ही नहीं रही थी।

जैसे विष्णुशर्मा ने प्रण कर लिया था कि वह छह महीने के भीतर ही राजकुमारों को ज्ञानी बना देगा। उसी तरह कहानी ने ठान लिया था कि वह अपने भीतर से कहानियों के अंडे और चूजे तो निकालती जाएगी पर जब तक राजकुमार हाथ जोड़ कर कह नहीं देंगे कि उनकी अक्ल दुरुस्त हो गई, तब तक वह खत्म भी नहीं होगी।

राजकुमार दस कहानी का अंत जानने के लिए बैचैन थे। वे सोते जागते इन कहानियों के बारे में ही सौचते रहते। कहानी उन्हें इतनी पसंद आई कि उनके सौभाग्य से यह पूरी हुई भी तो वे ऐसी ही दूसरी कोई कहानी सुनने की जिद करने लगे। उन्हें यह पता ही नहीं चल रहा था कि विष्णुशर्मा कहानियों के मधु में ज्ञान नामक गुडुची का सत भी मिलाते जा रहे हैं जिसे अलग से चखने पर उन्हें पहले उबकाई आने लगती थी।

विष्णुशर्मा ने एक पर एक पांच कहानियां जड़ थी। कहानियां भी ऐसी कि एक कहानी के भीतर से दूसरी और दूसरी के भीतर से तीसरी कहानी इस तरह निकलती जा रही थी जैसे मकड़ी की नाभि से तार निकलता है और उसकी गति से जाला बनता जाता है।

हर तार अलग और फिर भी एक दूसरे से जुड़ा हुआ। हर बात साफ पर पेंच के भीतर पेंच, इस तरह कि ऊपर से दाल दिखाई देने वाली चीज को दुबारा देखने पर उसके भीतर कुछ काला दिखाई देने लगे। इस तरह कहते-कहाते एक पूरी किताब ही तैयार हो गई।

इसे उसने पांच खंडों में तैयार किया था। उसके मन में कहानियां लिखते समय मकड़ी के तार का रूपक रहा हो या कठपुतली के खेल में सूत्रधार का उदाहरण, उसने इस किताब का नाम रखा पंचतंत्र।………………..इससे आगे भाग-17 में पढ़िए…

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