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महिंद्रा सनतकदा महोत्सव का समापन: विद्वानों से संवाद, हस्तशिल्प प्रदर्शन और संगीत ने लिया विराम

हस्तशिल्प प्रदर्शनी, संवाद, लखनऊ और कोलकाता की समृद्ध खानपान की परंपरा को समझाते हुए पांच दिवसीय महिंद्रा सनतकदा महोत्सव का बुधवार को समापन हो गया। अंतिम दिन हीरादेवी ने मिथिला क्षेत्र से जुड़ी मधुबनी लोककला को जीवंत किया। हल्दी और नील जैसे प्राकृतिक रंगों से मछली, मोर और कमल जैसे प्रतीक रस्मों और त्योहारों को दर्शाया गया।

महोत्सव में फेरोजा ने उज्बेकिस्तान के मध्य एशियाई डिजाइन को अदरास हथकरघा से बने थैलों, परिधानों और प्राकृतिक पत्थरों से जड़े हस्तनिर्मित आभूषणों का संग्रह जिसमें बिलाकुजुक (कंगन) शामिल हैं का प्रदर्शन किया। ये मध्य एशिया की वस्त्र और डिजाइन विरासत को प्रतिबिंबित करते हैं। सादिक ने अफगान हस्तकला को प्रस्तुत किया। ज्यामितीय नमूनों वाले भेड़ की ऊन से बुने कालीन, परिधानों के सजावटी पैच और पारंपरिक अफगान टोपियां लोगों ने खूब पसंद कीं।

महोत्सव के अंतिम दिन अमीर-उद-दौला लाइब्रेरी में पुस्तक विमोचन और संवाद का कार्यक्रम आयोजित किया गया। डिस्कवरिंग जस्टिस सैयद करामत हुसैन शीर्षक की पुस्तक विमोचन और संवाद का कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसमें प्रो. हुमा ख्वाजा, आतिफ हनीफ और नूर खान ने आपस में संवाद किया। इस संवाद ने जस्टिस सैयद करामत हुसैन की विरासत को फिर से जीवंत किया। वो अलीगढ़ आंदोलन के प्रमुख स्तंभ और भारत में मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा के अग्रदूत थे। इंग्लैंड में कानून की शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे न्यायाधीश बने और लखनऊ में करामत हुसैन मुस्लिम गर्ल्स पीजी कॉलेज की स्थापना की।

लखनऊ से कोलकाता तक जायकों का सफ़र संवाद में मंजिलत फातिमा, राजीव लोचन, सुफिया किदवई और सायरा मुज्तबा ने बातचीत की। कोलकाता की सबसे पुराने शिया मुस्लिम परिवारों में जन्मी मंजिलत फातिमा अवध के शाही खानदान से अपनी वंशावली जोड़ती हैं। वह डॉ. कौकब कद्र मीरजा की पुत्री तथा वाजिद अली शाह और बेगम हजरत महल की वंशज हैं।

नई दिल्ली के नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट के पूर्व निदेशक राजीव लोचन एक ख्याति प्राप्त चित्रकार, शिक्षक और विद्वान हैं, जिनका कार्य कला, शिक्षा और अंतरविषयी सांस्कृतिक चिंतन को जोड़ता है। गोपाल दास ढाकी और उनके दल ने संगीत प्रदर्शन में कोलकाता की लय प्रस्तुत की। कोलकाता की भावपूर्ण विदाई परंपरा के अनुरूप गोपाल दास ढाकी और उनके दल ने कोलकाता की दुर्गा पूजा के ध्वन्यात्मक परिदृश्यों को पुनर्सृजित करते हुए कलकत्ता की लयें प्रस्तुत कीं।

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