
दिव्यांगों के लिए बड़ी राहत! पुनर्वास विश्वविद्यालय अब खुद बनाएगा कृत्रिम अंग के पार्ट्स, बाजार पर निर्भरता खत्म
दिव्यांगों के सशक्तिकरण की दिशा में डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय एक और बड़ी पहल करने जा रहा है। शिक्षा में दिव्यांगों को 50 प्रतिशत आरक्षण देने वाला विश्वविद्यालय अब दिव्यांगजनों के लिए कृत्रिम अंगों के कई भागों का निर्माण अपने परिसर में करेगा। सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोकेमिकल इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सिपेट) और पुनर्वास विश्वविद्यालय के बीच इसे लेकर जल्दी ही समझौता ज्ञापन (एमओयू) होने जा रहा है। इसके बाद विश्वविद्यालय परिसर में सिपेट के सहयोग से कृत्रिम पैर का पंजा सहित अन्य पार्ट्स की निर्माण प्रक्रिया शुरू हो सकेगी।
कैड-कैम और थ्रीडी प्रिंटिंग का प्रशिक्षण
सिपेट में आयोजित दो दिवसीय थ्रीडी प्रिंटिंग और कम्प्यूटर एडेड डिजाइन (कैड) आधारित स्किल अपग्रेडेशन ट्रेनिंग प्रोग्राम के दौरान विश्वविद्यालय और सिपेट के अधिकारियों के बीच विस्तार से बातचीत हुई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डीन एकेडमिक्स प्रो. वीके सिंह रहे। सिपेट लखनऊ के जॉइंट डायरेक्टर एवं हेड विवेक कुमार सिंह, हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. यशवंत वीरोदय, सिपेट के टेक्निकल ऑफिसर कृष्ण प्रताप सिंह और विवि के कृत्रिम अंग एवं पुनर्वास केंद्र के कार्यशाला प्रबंधक डॉ. रणजीत सिंह भी मौजूद रहे।
मंगलवार को विश्वविद्यालय के एमपीओ और बीपीओ पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों को कैड-कैम और थ्रीडी प्रिंटिंग की तकनीकी ट्रेनिंग दी गई, जिससे वे डिजिटल तकनीक के माध्यम से आधुनिक कृत्रिम अंग तैयार कर सकें। ट्रेनिंग का उद्देश्य विद्यार्थियों को रोजगार, एंटरप्रेन्योरशिप और स्टार्टअप के लिए भी तैयार करना है।
अब तक बाजार से खरीदे जाते थे कृत्रिम अंग
अब तक विश्वविद्यालय को दिव्यांगों के लिए कृत्रिम अंगों के पार्ट्स ओपन मार्केट से खरीदने पड़ते थे। लेकिन सिपेट के साथ हुए एमओयू के बाद कई प्रमुख कृत्रिम अंग अब विश्वविद्यालय परिसर में ही तैयार किए जाएंगे। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार इसे तैयार करने में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रहेगी।
विश्वविद्यालय के कृत्रिम अंग एवं पुनर्वास केंद्र की ओर से दिव्यांगजनों को नि:शुल्क कृत्रिम अंग उपलब्ध कराए जाते हैं। इससे यह पहल न केवल तकनीकी बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विश्वविद्यालय परिसर में निर्माण होने के बाद भी कृत्रिम अंग निशुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे। इसके अलावा कृत्रिम अंग निर्माण में छात्रों में शोध को बढ़ावा देने का प्रयास भी किया जाएगा।
कोट
“विश्वविद्यालय का उद्देश्य शिक्षा के साथ दिव्यांगजनों के जीवन को आसान और आत्मनिर्भर बनाना है। थ्रीडी प्रिंटिंग और आधुनिक तकनीक के माध्यम से कृत्रिम अंगों की गुणवत्ता बेहतर होगी और दिव्यांगों को समय पर सहायता मिल सकेगी। इससे हमारे विद्यार्थी भी तकनीकी रूप से दक्ष होंगे और रोजगार व स्टार्टअप की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।



