निर्वाचन आयोग की दो टूक : कानूनी रूप से वैध हैं हमारे सभी फैसले, अलग राय होना एक सामान्य प्रक्रिया
निर्वाचन आयोग के कई फैसलों पर दो आयुक्तों द्वारा लिखित आपत्ति दर्ज कराए जाने की खबर सामने आने के बाद बुधवार को सियासी बवंडर खड़ा हो गया और विपक्षी दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार पर आयोग के कामकाज को हाईजैक करने तथा तानाशाही चलाने का आरोप लगाया और उन्हें पद से हटाए जाने की मांग की।
वहीं दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग ने कहा कि उसके सभी आधिकारिक आदेश, फैसले और प्रशासनिक निर्देश पूरी तरह से कानूनी रूप से सही हैं और किसी भी संस्थान में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
आयोग ने अंग्रेजी दैनिक ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक खबर के बाद जारी एक बयान में यह टिप्पणी की है। खबर में कहा गया है कि देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने विभिन्न राज्यों में नाम हटाए जाने सहित कई मुद्दों पर आपत्ति जताई थी। आयोग ने यह भी कहा कि निर्वाचन आयुक्तों द्वारा दिए गए सुझाव चुनावी प्रक्रियाओं में और सुधार के लिए थे।
निर्वाचन आयोग ने कहा कि वह भारतीय लोकतंत्र को आगे बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को समझते हुए पूरी निष्ठा के साथ अपने संवैधानिक दायित्वों को निभाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। बयान में कहा गया है कि आयोग द्वारा जारी सभी आधिकारिक आदेश, फैसले और प्रशासनिक निर्देश पूरी तरह से कानूनी रूप से वैध हैं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के तहत स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हैं।
चुनाव आयोग बोला- अंतिम निर्णय ही सर्वोपरि
बयान के अनुसार मसौदा तैयार करने के चरण के दौरान आयोग के सदस्यों द्वारा उठाए गए किसी भी प्रक्रियागत सवाल या दिए गए सुझाव मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से अपनाई जाने वाली सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। निर्वाचन आयुक्तों द्वारा दिए गए सुझाव चुनावी प्रक्रियाओं में और सुधार के लिए थे। बयान में यह भी कहा गया है कि किसी भी संस्थान में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। अंतिम निर्णय लिए जाने से पहले वे निर्णय लेने की प्रक्रिया का ही हिस्सा होती हैं। केवल तीनों निर्वाचन आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का प्रत्येक अधिकारी भी चुनावी व्यवस्था में सुधार के लिए आयोग को अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह अधिकृत है।



