रावण की पूजा, आरती और तेरहवीं… इटावा में संकटमोचक के रूप में पूजे जाते हैं लंकापति, जानिए क्या है 167 साल पुरानी परंपरा
देशभर में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के जसवंतनगर में परंपरा कुछ अलग है। यहां रावण को संकटमोचक मानकर उसकी आरती उतारी जाती है और पूजा की जाती है।
रावण वध के बाद पुतले को आग लगाने के बजाय पत्थरों और लाठियों से गिराया जाता है। इसके बाद लोग पुतले की लकड़ियां, बांस की खपच्चियां और दूसरी सामग्री अपने घर ले जाते हैं। स्थानीय मान्यता है कि इन वस्तुओं को घर में रखने से विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि आती है।
167 साल पुरानी है जसवंतनगर की रामलीला
जसवंतनगर की रामलीला अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण देशभर में अलग पहचान रखती है। रामलीला समिति के प्रबंधक राजीव गुप्ता बबलू के मुताबिक, इस आयोजन का इतिहास करीब 167 वर्ष पुराना है। इसकी शुरुआत वर्ष 1855 में हुई थी, लेकिन 1857 के विद्रोह के कारण आयोजन बाधित हो गया। वर्ष 1859 से रामलीला का आयोजन लगातार जारी है।
उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में रामलीला केवल दिन में आयोजित होती थी। बाद में प्रकाश की बेहतर व्यवस्था होने के साथ रात में भी इसका मंचन शुरू हो गया। उनके अनुसार, उनके पूर्वज सौराष्ट्र से यहां आए थे और जसवंतनगर को अपना स्थायी निवास बनाने के बाद रामलीला की परंपरा आगे बढ़ी।
दशहरे पर पहले होती है रावण की आरती
जसवंतनगर के रामलीला मैदान में नवरात्र की सप्तमी को करीब 15 फुट ऊंचा रावण का पुतला स्थापित किया जाता है। दशहरे के दिन शाम से राम और रावण की सेनाओं के बीच युद्धलीला शुरू होती है। दोनों पक्ष डोलों पर सवार होकर युद्ध का प्रदर्शन करते हैं।
इस दौरान जब रावण अपनी सेना के साथ मैदान में पहुंचता है तो उसकी धूप-कपूर से आरती उतारी जाती है। लोग जयकारे भी लगाते हैं। यह दृश्य सामान्य रामलीलाओं से अलग होता है, जहां रावण को बुराई के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
पंचक मुहूर्त में होता है रावण वध
रामलीला समिति के प्रबंधक राजीव गुप्ता के मुताबिक, देश के अधिकांश हिस्सों में 20 अक्टूबर को दशहरा मनाया जाएगा, जबकि जसवंतनगर में रावण वध 21 अक्टूबर को पंचक मुहूर्त में होगा। यहां रामलीला की तिथियां और रावण वध का समय पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार निर्धारित किया जाता है।
रात करीब 10 बजे रावण वध की लीला होती है। इसके बाद पुतले को जलाने के बजाय पत्थरों और लाठियों से गिराया जाता है। मैदान में मौजूद लोग पुतले की लकड़ियां, बांस की खपच्चियां, कपड़े और अन्य सामग्री बटोरने लगते हैं।
रावण के पुतले की लकड़ियां घर ले जाने की मान्यता
जसवंतनगर में रावण के पुतले की सामग्री घर ले जाने की परंपरा भी खास है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इन वस्तुओं को घर में रखने से भूत-प्रेत का प्रकोप नहीं होता, विद्वता आती है और धन-समृद्धि बढ़ती है। यही वजह है कि रावण वध के बाद लोग पुतले की सामग्री लेने के लिए जुट जाते हैं।
इतना ही नहीं, यहां रावण वध के बाद उसकी तेरहवीं भी मनाई जाती है। इस अवसर पर कस्बे के लोगों को आमंत्रित किया जाता है। रावण की आरती से लेकर उसकी तेरहवीं तक की रस्में जसवंतनगर की रामलीला को विशिष्ट बनाती हैं।
दक्षिण भारतीय शैली के धातु के मुखौटे हैं खास पहचान
जसवंतनगर की रामलीला खुले मैदान में दक्षिण भारतीय शैली में आयोजित की जाती है। इसमें रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण समेत प्रमुख पात्र तांबे, पीतल और लोहे जैसी धातुओं से बने मुखौटे पहनकर युद्धलीला का प्रदर्शन करते हैं। कलाकारों के माथे पर भगवान शिव के त्रिपुंड का तिलक भी लगाया जाता है। इन मुखौटों में रावण का मुखौटा सबसे बड़ा और आकर्षक होता है। इसमें दस सिर जुड़े होते हैं और इन्हें प्राकृतिक रंगों से सजाया जाता है। मुखौटों की बनावट और पारंपरिक रंग-सज्जा दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मिली पहचान
जसवंतनगर की रामलीला को उसकी विशिष्ट शैली और परंपराओं के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2010 में यूनेस्को की रामलीलाओं से संबंधित रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया गया था। त्रिनिदाद की शोधार्थी इंद्राणी रामप्रसाद ने 400 से अधिक रामलीलाओं पर शोध किया है। बताया जाता है कि उन्हें जसवंतनगर जैसी विशिष्ट परंपराओं वाली रामलीला अन्यत्र देखने को नहीं मिली।
रावण की आरती, पुतले को जलाने के बजाय गिराना, उसकी सामग्री घर ले जाना और तेरहवीं मनाना-ये सभी परंपराएं जसवंतनगर की रामलीला को अलग पहचान देती हैं। वर्षों से चली आ रही यह लोक परंपरा आज भी लोगों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बनी हुई है।



