बढ़ता CO₂ बदल सकता है गेहूं का प्रोटीन, आटे की क्वालिटी और पाचन पर पड़ेगा असर
जलवायु परिवर्तन का असर अब गेहूं की फसल की गुणवत्ता पर भी दिखाई दे सकता है। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का स्तर बढ़ने से गेहूं में मौजूद प्रोटीन की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। इसका असर न केवल आटे से बनने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर पड़ सकता है, बल्कि गेहूं से बने भोजन को पचाने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है।
‘फूड केमिस्ट्री’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के दौर में फसलों को भविष्य के वातावरण के अनुकूल बनाने की रणनीति में केवल पैदावार बढ़ाने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। गेहूं में प्रोटीन की संरचना और उससे जुड़ी गुणवत्ता संबंधी विशेषताओं को भी प्राथमिकता देनी होगी।
2050 तक 600 PPM तक पहुंच सकता है CO₂ का स्तर
जर्मनी के म्यूनिख स्थित टेक्निकल यूनिवर्सिटी के लाइबनिज इंस्टीट्यूट फॉर फूड सिस्टम्स बायोलॉजी के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने बताया कि वैश्विक स्तर पर CO₂ की मात्रा 1980 में 340 पार्ट्स प्रति मिलियन (PPM) थी, जो 2024 में बढ़कर करीब 425 PPM हो गई। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 2050 तक यह स्तर 600 PPM तक पहुंच सकता है।
गेहूं दुनिया की प्रमुख खाद्य फसलों में शामिल है और आने वाले समय में इसकी खेती अधिक CO₂ वाली परिस्थितियों में होने की संभावना है।
10 गेहूं की किस्मों पर किया गया अध्ययन
शोधकर्ताओं ने सर्दियों में उगाई जाने वाली गेहूं की 10 उन्नत किस्मों को खेती और पर्यावरण की वास्तविक परिस्थितियों में उगाया। इनमें कुछ पौधों को 546 PPM की बढ़ी हुई CO₂ सांद्रता में रखा गया, जबकि अन्य को मौजूदा CO₂ स्तर पर उगाया गया।
फसल तैयार होने के बाद वैज्ञानिकों ने अपने विकसित किए गए हाई-रिजॉल्यूशन ‘मास स्पेक्ट्रोमेट्रिक’ तरीके से गेहूं के अलग-अलग नमूनों में मौजूद प्रोटीन की संरचना का विश्लेषण किया। इस दौरान एमाइलेज/ट्रिप्सिन इन्हिबिटर (ATI), प्यूरोइंडोलिन, ग्लूटेन प्रोटीन और सीलिएक रोग को सक्रिय करने वाले पेप्टाइड पर विशेष ध्यान दिया गया।
बढ़ी CO₂ में ATI की मात्रा बढ़ी
अध्ययन में पाया गया कि CO₂ की अधिक सांद्रता में गेहूं में एमाइलेज/ट्रिप्सिन इन्हिबिटर (ATI) की मात्रा बढ़ गई। वहीं, प्यूरोइंडोलिन, ग्लूटेन प्रोटीन और सीलिएक रोग को सक्रिय करने वाले कुछ पेप्टाइड की मात्रा कम हो गई।
शोधकर्ताओं के अनुसार, ये पेप्टाइड पाचन के दौरान ग्लूटेन प्रोटीन से बन सकते हैं। वहीं, ATI की बढ़ी हुई मात्रा मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
लाइबनिज इंस्टीट्यूट की प्रमुख शोधकर्ता सबरीना गाइस्लिट्ज ने कहा कि इन बदलावों की सीमा काफी हद तक गेहूं की संबंधित किस्म पर निर्भर करती है। उन्होंने यह भी बताया कि ग्लूटेन प्रोटीन की कम सांद्रता का संबंध भोजन पकाने की खराब गुणवत्ता से था।
गेहूं से जुड़ी बीमारियों पर भी पड़ सकता है असर
संस्थान में खाद्य बायोपॉलिमर रसायन शोध समूह की प्रमुख और टीयूएम स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज में खाद्य बायोपॉलिमर प्रणाली की प्रोफेसर कैथरीना शेर्फ के मुताबिक, ATI और सीलिएक रोग को सक्रिय करने वाले कुछ पेप्टाइड में हुए बदलाव लंबे समय में गेहूं से संबंधित बीमारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि इन बदलावों के वास्तविक जैविक और प्रतिरक्षा संबंधी महत्व को समझने के लिए अभी और अध्ययन की जरूरत है।
ऐसी गेहूं की किस्में विकसित करने पर जोर
शोधकर्ताओं का कहना है कि अध्ययन के नतीजे ऐसी गेहूं की किस्मों की पहचान और विकास की जरूरत को रेखांकित करते हैं, जो वातावरण में CO₂ की बढ़ती मात्रा के बावजूद अच्छी बेकिंग क्वालिटी बनाए रख सकें।
साथ ही ऐसी किस्मों पर भी ध्यान देने की जरूरत है, जिनमें शरीर द्वारा सहन न किए जाने वाले प्रोटीन कम मात्रा में हों। अध्ययन के लेखकों के मुताबिक, बढ़ती CO₂ सांद्रता गेहूं की प्रोटीन संरचना को बदल सकती है और इससे अनाज की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।



