क्या ममता बनर्जी इस्तीफ़ा दिए बिना सत्ता में रह सकती हैं? जानें संवैधानिक नियम
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 207 सीटें जीतकर निर्णायक बहुमत हासिल किया है, जबकि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) महज 80 सीटों पर सिमट गई है। इस बड़ी हार के बावजूद, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पद छोड़ने से साफ़ इनकार कर दिया है, जिससे एक गंभीर संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा होती दिख रही है।
चुनाव में मिली हार के बाद मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए, बनर्जी ने आरोप लगाया कि BJP ने जनादेश चुरा लिया है। उन्होंने आगे दावा किया कि चुनाव आयोग ने नतीजों को प्रभावित करने के लिए BJP के इशारे पर काम किया, और यह भी कहा कि वह अपना इस्तीफ़ा देने के लिए राजभवन नहीं जाएँगी।
इस मुद्दे पर बोलते हुए, वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह, जो वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रमुख हैं, ने समझाया कि तकनीकी रूप से एक मुख्यमंत्री ‘डॉक्ट्रिन ऑफ़ प्लेज़र’ (प्रसन्नता के सिद्धांत) नामक संवैधानिक सिद्धांत के तहत पद धारण करता है। इसका मतलब है कि मुख्यमंत्री का कार्यकाल विधानसभा के विश्वास और, औपचारिक रूप से, राज्यपाल के अधिकार के अधीन होता है।
हालाँकि, व्यवहार में, यह “प्रसन्नता” मनमानी नहीं होती है। जब तक किसी मुख्यमंत्री को सदन में बहुमत का समर्थन प्राप्त होता है, तब तक राज्यपाल हस्तक्षेप नहीं कर सकते। जब वह बहुमत खो जाता है, तो स्थिति नाटकीय रूप से बदल जाती है।
जब राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है
सिंह के अनुसार, विभिन्न राज्यों के उदाहरण दिखाते हैं कि जब कोई सरकार अल्पमत में आ जाती है, तो राज्यपाल सत्ता का परीक्षण करने या उसे पुनर्गठित करने के लिए हस्तक्षेप कर सकते हैं। पहला कदम आमतौर पर मौजूदा मुख्यमंत्री से विधानसभा के पटल पर अपना बहुमत साबित करने के लिए कहना होता है। यदि संख्याएँ स्पष्ट रूप से उनके पक्ष में नहीं हैं—या यदि मुख्यमंत्री आदेश का पालन करने या इस्तीफ़ा देने से मना कर देते हैं—तो राज्यपाल अन्य विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। सिंह ने कहा “ऐसी असाधारण स्थिति में, गवर्नर के पास संवैधानिक दायरे में रहते हुए किसी दूसरे नेता को—आमतौर पर सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन से—सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने का पूरा अधिकार होता है।
यह आमंत्रण निवर्तमान मुख्यमंत्री की सहमति पर निर्भर नहीं होता। एक बार जब गवर्नर को यह भरोसा हो जाता है कि कोई वैकल्पिक नेता बहुमत का समर्थन हासिल कर सकता है, तो वे नए मुख्यमंत्री को पद की शपथ दिला सकते हैं।
ऐसी स्थिति में कोई संवैधानिक गतिरोध नहीं होता
सिंह ने सुझाव दिया कि मौजूदा मुख्यमंत्री का इस्तीफ़ा देने से इनकार करना कोई संवैधानिक गतिरोध पैदा नहीं करता। इसके बजाय, यह गवर्नर के विवेकाधीन अधिकार को सक्रिय कर देता है, जिससे लोकतांत्रिक कामकाज को बनाए रखने के लिए सत्ता का हस्तांतरण सुचारू रूप से हो पाता है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इस तरह के इनकार अक्सर राजनीतिक प्रकृति के होते हैं, जिनका उद्देश्य संवैधानिक अधिकार के बजाय जनता की राय को प्रभावित करना होता है।




