Election Commissioners की साख पर गहराया महा-संकट! निष्पक्षता पर उठी उंगली, क्या Supreme Court लेगा चुनाव आयोग में असहमति का स्वतः संज्ञान?
देश की चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर एक बार फिर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि विवादित ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) प्रक्रिया के कई अहम पहलुओं पर पिछले 10 महीनों में तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग (ECI) के दो चुनाव आयुक्तों ने 14 अलग-अलग मौकों पर अपनी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की साख पर सवाल उठाते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। समाजवादी पार्टी (SP) के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले का स्वतः संज्ञान (Suo Moto) लेने की मांग की है, जबकि कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने आरोप लगाया है कि आयोग को कोई “अदृश्य ताकत” संचालित कर रही है। राजनीतिकख़बरें पढ़ें
चुनाव आयोग के अंदर असहमति पर रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
जांच से पता चला है कि दो चुनाव आयुक्तों – सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी – ने नए वोटर रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट से वोटरों के नाम हटाने और उन्हें वापस जोड़ने, और SIR प्रक्रिया में वोटरों को बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील दायर करने जैसे कई पहलुओं पर आपत्ति जताई थी। तीन सदस्यीय चुनाव आयोग (ECI) के प्रमुख CEC ज्ञान कुमार हैं, जिन्हें SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्ष की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है।
अयोग्य और मृत वोटरों को हटाने के लिए SIR प्रक्रिया पिछले साल जून में बिहार से शुरू हुई थी। इसके तहत अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से ज़्यादा नाम हटाए जा चुके हैं। सबसे ज़्यादा नाम दिल्ली और महाराष्ट्र की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए गए।
SIR प्रक्रिया को लेकर सबसे ज़्यादा विवाद पश्चिम बंगाल में हुआ, जहाँ इस साल अप्रैल में चुनाव हुए और BJP ने TMC के गढ़ में ऐतिहासिक जीत हासिल की। SIR प्रक्रिया के बाद बंगाल में वोटर लिस्ट से लगभग 91 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए। पिछले हफ्ते, ECI ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ट्रिब्यूनल के पास 38 लाख अपीलें लंबित हैं। इनमें से 22.21 लाख अपीलें उन वोटरों ने दायर की थीं जिनके नाम हटा दिए गए थे।
दिलचस्प बात यह है कि बाकी 16.10 लाख अपीलें उन वोटरों के खिलाफ दायर की गई थीं जिनके नाम न्यायिक अधिकारियों ने शामिल किए थे और उनके नाम हटाने की मांग की गई थी। ‘एक्सप्रेस’ की जांच से पता चला कि सुखबीर संधू ने यह मुद्दा उठाया और सवाल किया कि ECI ने उन वोटरों के खिलाफ अपील क्यों की जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने शामिल किया था।
संधू ने दर्ज किया कि न तो उन्हें, न ही जोशी को और न ही पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) को अपील दायर करने के आधार या प्रक्रिया के बारे में सूचित किया गया था।
विपक्ष ने जताई चिंता
इसे “बहुत गंभीर” घटनाक्रम बताते हुए अखिलेश यादव ने ज़ोर दिया कि बार-बार होने वाले मतभेद यह बताते हैं कि चुनाव आयुक्त अपनी ज़िम्मेदारियाँ ठीक से नहीं निभा पा रहे हैं।
अखिलेश ने ट्वीट किया, “अगर किसी स्वतंत्र संस्था के सदस्यों को निष्पक्ष रूप से काम करने की आज़ादी नहीं है या उनकी चिंताओं को नहीं सुना जाता है, तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक और चिंताजनक स्थिति है।”
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस रिपोर्ट से ECI की विश्वसनीयता को धक्का लगा है। तिवारी ने कहा, “अगर नियमों का पालन नहीं किया गया और ऐसे फ़ैसले लिए गए जो सर्वसम्मति या बहुमत से नहीं थे, तो ECI के सभी फ़ैसले मनमाने और बिना किसी ठोस आधार के माने जाएँगे, भले ही वे पूरी तरह से गैर-कानूनी न हों।”
उन्होंने आगे कहा, “शायद यह महाभियोग की प्रक्रिया पर गंभीरता से विचार करने का सही मामला है, लेकिन इससे भी ज़रूरी बुनियादी सवाल यह है कि ECI की विश्वसनीयता को फिर से कैसे बहाल किया जा सकता है।



