उत्तर प्रदेश

खुद को गंभीर राष्ट्रीय नेता के रूप में कब और कैसे स्थापित करेंगे राहुल गांधी?

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लोकसभा का माहौल आज अचानक गरमा गया जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी बोलने के लिए खड़े हुए। अपने भाषण की शुरुआत में उन्होंने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे के एक अप्रकाशित संस्मरण का हवाला दिया। बस यही वह बिंदु था जहां से टकराव शुरू हुआ।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तुरंत आपत्ति जताई कि जिस पुस्तक का प्रकाशन ही नहीं हुआ उसे सदन में उद्धृत करना नियम के विरुद्ध है। गृह मंत्री अमित शाह भी खड़े हुए और कहा कि सदन नियमों से चलता है, किसी सदस्य को नियम तोड़ने की छूट नहीं दी जा सकती।

हालांकि राहुल गांधी ने कहा कि उनके पास जो सामग्री है वह प्रामाणिक है और वह देश की सुरक्षा से जुड़ा सवाल उठा रहे हैं। उनका तर्क था कि पहले कुछ सदस्यों ने कांग्रेस की देशभक्ति पर सवाल उठाए, इसलिए उन्हें जवाब देना पड़ा। इस पर अमित शाह ने स्पष्ट कहा कि पहले के वक्तव्य में विपक्ष की देशभक्ति पर कोई आरोप नहीं लगाया गया था, बल्कि पूर्व काल की नीतियों और दिशा पर चर्चा हुई थी। लोकसभा अध्यक्ष ने भी हस्तक्षेप करते हुए कहा कि जिन विषयों की चर्चा सूची में नहीं है और जिनसे देश की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंच सकती है, उन्हें उठाने से बचना चाहिए।

विवाद यहीं नहीं रुका। राहुल गांधी ने भारत चीन संबंधों और सीमा की स्थिति का जिक्र करना चाहा। लोकसभा अध्यक्ष ने दोहराया कि चर्चा का विषय राष्ट्रपति का अभिभाषण है और सभी को मर्यादा रखनी चाहिए। शोर शराबा बढ़ा, अन्य विपक्षी सदस्य भी खड़े हो गए और अंत में कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।

हम आपको बता दें कि इससे पहले सत्ता पक्ष के एक सदस्य ने पूर्व काल को खोए अवसरों का दशक बताते हुए वर्तमान और पूर्व नेतृत्व के अंतर पर प्रहार किया था, जिसने माहौल पहले से ही तीखा कर दिया था। दिन भर की इस खींचतान में एक बात साफ दिखी कि सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों ने प्रक्रिया और नियमों का सहारा लेकर राहुल गांधी को बार बार रोका। यह रोक राजनीतिक संकेत भी था कि सेना, सीमा और देश की सुरक्षा जैसे विषयों पर बिना ठोस और औपचारिक आधार के बयान देने की छूट नहीं दी जाएगी। बाद में कुछ मंत्रियों ने यह भी कहा कि सदन की गरिमा से ऊपर कोई नहीं, चाहे वह किसी भी परिवार से आता हो।

देखा जाये तो सवाल यह है कि राहुल गांधी बार बार ऐसे संवेदनशील विषयों पर विवादित या अधूरी जानकारी के सहारे बोलते क्यों हैं? उनके आलोचकों का मानना है कि यह उनकी राजनीति की शैली का हिस्सा है जहां वह तीखे आरोप लगाकर चर्चा का केंद्र बनना चाहते हैं। सेना, सीमा और देश की सुरक्षा जैसे मुद्दे भावनात्मक भी हैं और गंभीर भी। इन पर कही गई हर बात का असर देश के भीतर और बाहर दोनों जगह पड़ता है। ऐसे में आधी जानकारी या अप्रमाणित स्रोत का सहारा राजनीतिक लाभ से ज्यादा हानि कर सकता है।

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