संसद के मानसून सत्र के अंतिम दौर में परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है। शरद पवार गुट के सांसदों का सुप्रिया सुले के नेतृत्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके आवास पर मिलना महज महाराष्ट्र के सूखे, सिंचाई और क्षेत्रीय मांगों तक सीमित मुलाकात नहीं माना जा रहा। बैठक के बाद भले ही परिसीमन विधेयक पर प्रत्यक्ष चर्चा से इंकार किया गया हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने तलाशे जाने लगे हैं। खासकर इसलिए कि शरद पवार गुट के बारे में पहले से संकेत मिलते रहे हैं कि वह विधेयक के अंतिम स्वरूप और सभी राज्यों में लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत वृद्धि जैसी शर्तों के आधार पर सरकार के प्रस्ताव का समर्थन कर सकता है।
मोदी सरकार का FCRA विधेयक को आज के लोकसभा एजेंडे में नहीं रखना इसी रणनीतिक गणित को हवा देता है। रिपोर्टों में यह संभावना जताई गई है कि सरकार विवादित FCRA प्रावधानों पर तत्काल टकराव से बचकर उन दलों के साथ राजनीतिक संवाद की गुंजाइश बनाए रखना चाहती है, जिनकी जरूरत परिसीमन जैसे बड़े संवैधानिक मुद्दे पर पड़ सकती है। हालांकि इसका एक दूसरा कारण भी हो सकता है कि सरकार विधेयक पर विस्तृत बहस चाहती हो। इसलिए इसे किसी पक्के राजनीतिक सौदे का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी।
सबसे दिलचस्प मोर्चा DMK का है। तमिलनाडु में परिसीमन को लेकर DMK लगातार दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व की चिंता उठा रही है। पार्टी सांसद कनिमोझी ने हाल में साफ कहा कि DMK अपने पुराने रुख पर कायम है और तमिलनाडु के प्रतिनिधित्व की रक्षा तथा ‘Fair Delimitation’ की मांग से पीछे नहीं हटी है। पार्टी ने यह भी कहा कि सरकार ने मौजूदा सत्र में विधेयक लाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है और संशोधित मसौदा भी उसके सामने नहीं आया है।
इसलिए यह कहना अभी सही नहीं होगा कि एमके स्टालिन सरकार के साथ आ गए हैं। लेकिन राजनीति में दरवाजे बंद होने और बातचीत की गुंजाइश बने रहने के बीच फर्क होता है। परिसीमन का प्रश्न दक्षिण बनाम उत्तर की राजनीति से जुड़ा होने के कारण DMK का रुख निर्णायक महत्व रख सकता है। यदि केंद्र सरकार तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों की आशंकाओं का निराकरण करने वाला कोई ऐसा फार्मूला निकालती है, जिसमें प्रतिनिधित्व का संतुलन बना रहे, तो मौजूदा राजनीतिक विरोध में दरार की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
शरद पवार के मामले में भी तस्वीर इसी तरह सावधानी से पढ़नी होगी। प्रधानमंत्री से मुलाकात को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज हुई हैं, लेकिन सुले ने स्पष्ट किया है कि विधेयक सामने आने के बाद ही पार्टी अपना रुख तय करेगी। यानी पवार खेमे का समर्थन अभी ‘तय’ नहीं, बल्कि संभावित समर्थन की राजनीतिक संभावना है।
फिर भी भाजपा के लिए यह घटनाक्रम विपक्षी एकजुटता की परीक्षा जरूर है। राहुल गांधी और केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बीच परिसीमन सहित गतिरोध पर हुई बातचीत को सरकार की ओर से ‘अच्छी’ बातचीत बताया गया और यह संदेश दिया गया कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संवाद के रास्ते बंद नहीं हैं।
उधर, आज भी हंगामे के कारण संसद के दोनों सदनों का कामकाज प्रभावित हुआ, लेकिन सत्र के अंतिम दिनों में परिसीमन पर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ती दिख रही हैं। सरकार यदि इस सत्र में विधेयक के लिए पर्याप्त राजनीतिक सहमति जुटा पाती है, तो यह उसके लिए बड़ी संसदीय उपलब्धि होगी। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल होगा कि क्या वह ऐसी सहमति बना पाएगी जो उत्तर-दक्षिण प्रतिनिधित्व के विवाद को शांत कर सके?
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मोदी सरकार ने परिसीमन को केवल सदन की संख्या का सवाल न रहने देकर उसे व्यापक राजनीतिक बातचीत का केंद्र बना दिया है। शरद पवार गुट के साथ संवाद और DMK की चिंताओं को साधने की कोशिश इसी बड़े समीकरण के संकेत हैं। यदि भाजपा इस गणित को साध लेती है, तो विपक्ष के लिए चुनौती केवल एक विधेयक का विरोध करना नहीं होगी, बल्कि बदलते राजनीतिक और चुनावी समीकरण का जवाब देना भी होगा।