Shrimanta Shankardev-पूर्वोत्तर राज्य की महान विभूति के मुख्य भाग में आपने पढ़ा कि…..Shrimanta Shankardev को विशाल नदी में तैरना भी उनको प्रिय था। किंतु बाद में दादी की प्रेरणा से वे तेरह साल की अवस्था में गुरु महेंद्र कंदली की टोल पाठशाला में पढऩे गए।  अब इसके आगे पढ़िए कि…………

 

वर्णमाला का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात शंकरदेव (Shankardev) ने सरल शब्दों में एक भावपूर्ण कविता की रचना करके अपने गुरू को सुनाई।
गुरुजी उनकी रचना प्रतिभा को देखकर दंग रह गए। कविता की पंक्तियां देखिए-

करतल कमल कमल दल नयन।
भवदन दहन पर शतरत गमय।।
नपर नपर पर शतरत गमय।
समय नभय भय समहर समतय।।
खर तत बर शर हत दशवदन।
खगचर नगधर फणधर शयन।।

22 वर्ष की अवस्था तक शंकरदेव (Shankardev) गुरु गृह में रहकर शिक्षा प्राप्त करते रहे। शंकरदेव (Shankardev) मेधावी छात्र थे। अल्प समय में ही उन्होंने श्रुति-स्मृति, साहित्य-व्याकरण, ज्योतिष, इतिहास, कोश, भगवान पुराण, महाभारत एवं रामायण आदि का गहन अध्ययन कर लिया।

गुरु गृह में रहते हुए ही शंकरदेव (Shankardev) ने मार्कण्डेय पुराण के आधार पर हरिशचन्द्र उपाख्यान की रचना की। पाठशाला में पढ़ते समय एक दिन शंकरदेव (Shankardev) धूप में सो गए। उनके मुख पर पड़ती हुई धूप से रक्षा करने के लिए एक काले नाग ने अपना फन फैला रखा था।

इस दृश्य को देखकर गुरु माधव कंदली ने उन्हें देव की उपाधि से विभूषित किया और तब वे शंकर से शंकरदेव (Shankardev) बन गए। अध्ययन के पश्चात शंकरदेव अपने गांव बरदोवा लौट आए। उन्हें परंपरानुसार अपनी रियासत का कार्यभार संभालना पड़ा।

उनकी प्रजा उन्हें डेका गिरी युवा स्वामी कहती थी। उन्होंने भूइयां राज्य में सुशासन की स्थापना की। शंकरदेव (Shankardev) का विवाह सूर्यवती नामक कन्या से हुआ जो एक कन्या को जन्म देकर दिवंगत हो गईं। सूर्यवती के देहांत से शंकरदेव के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया।

अब उनका मन घर-बार, राज-पाट आदि सांसारिक कार्यों से उचट गया। मातृहीना पुत्री मनु हरि प्रिया का विवाह उन्होंने हरि भूइयां से कर दिया और दामाद को घर व राज्य का भार सौंपकर स्वंय बत्तीस वर्ष की अवस्था सन 1481 में घर से तीर्थाटन हेतु निकल पड़े।

उनके राज्य पर पिता के समय से ही कछारी आक्रामण कर रहे थे, उनके समय भी आक्रमण होते रहे। राजनैतिक असुरक्षा, समाजिक अशांति और धार्मिक आडंबर ने उनकी वैराग्य भावना को बल प्रदान किया।
बारह वर्ष तक भारत के विभिन्न तीर्थों का भ्रमण किया। सन 1493 में उनके लौटने से स्वजनों में नया उत्साह जागा। कुटुंबियों ने उन्हें पुन: संसारी बन शिरोमणि भूइयां का पद ग्रहण करने का आग्रह किया।
उन्होंने यथार्थपरक दृष्टि अपनाई। समाज का उपचार करने के पूर्व अपने को उसके अनुरुप एवं उसकी अभिन्न इकाई बन जाना आवश्यक समझकर ही अड़तालीस वर्ष की अवस्था सन 1497 में उन्होंने कालिका भूइयां की पुत्री कालिन्दी से विवाह कर लिया।

कालिन्दी से उनके तीन पुत्र-रामानन्द, कमललोचन और हरिचरण एवं एक पुत्र रुक्मिणी भी हुई।
उनका शेष जीवन कृष्ण-भक्ति के प्रचार-प्रसार में व्यतीत हुआ। विवाहोपरांत शंकरदेव (Shankardev) आलिपुखरी को छोड़कर अपने पैतृक ग्राम बरदोवा चले आए।

वहीं सन 1502 सत्र देवगृह, नामघर स्थापित कर धर्म प्रचार का कार्यारंभ किया। धर्म प्रचारार्थ सन 1516-17 में बरदोवा का परित्याग कर विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते हुए माजुली पहुंचे। वहीं उन्हें माधवदेव जैसा सुयोग्य शिष्य मिला।

बाद में पाटबाउंसी आ गए। वहीं से उन्होंने सन 1550 में अपने एक सौ बीस अनुयायियों के साथ जगन्नाथ पुरी की यात्रा की। यह उनकी दूसरी धार्मिक यात्रा थी। शंकरदेव (Shankardev) की ख्याति उनके द्वारा प्रचारित नव्य वैष्णव मत की स्थापना से थी।

जिसे एक शरण नाम धर्म अथवा महापुरुषिया मत कहा जाता है। उनकी बढ़ती लोकप्रियता के कारण अनेक कर्म-कांडियों और अवैष्णवों ने उनका विरोध किया।  शंकरदेव (Shankardev) की शिकायत कोचराज नरनारायण से भी की गई। राजा ने उन्हें बुला भेजा।

शंकरदेव (Shankardev) ने नरनारायण के दरबार में जाकर अपने पांडित्य और ज्ञान से सबको परास्त कर स्वप्रचारित मत की श्रेष्ठता सिद्घ की। बाद में राजा भी उनका मित्र बन गया। सन 1568 में कोचबिहार में बुखार से उनका देहांत हो गया।

श्रीकृष्ण भक्ति की जिस पद्घति को शंकरदेव ने अंगीकृत और प्रचारित किया उसमें भगवान की विग्रह-पूजा के स्थान पर नाम-स्मरण और कीर्तन को मान्यता मिली। श्री शंकरदेव (Shankardev) की रचनाओं में बरगीतों का महत्वपूर्ण स्थान है। ये गीत असमिया काव्य की बहुमूल्य देन है।

इसके आगे पढ़िए, भाग-2…………

 

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