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अदालतों की टिप्पणी महत्व​हीन क्यों हैं

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अभी दो दिन पहले दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत की पीठ ने दिल्ली दंगा मामले में गिरफ्तार तीन आरोपितों की जमानत का कारण अदालत में दी गई दिल्ली पुलिस की दलीलें ही बन गईं। संगीन धाराओं में गिरफ्तार किए गए जुनैद, इरशाद और चांद मोहम्मद को न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत की पीठ ने यह कहते हुए जमानत दे दी कि इस मामले में पुलिस के पास प्रत्यक्ष, पारिस्थितिकीय व वैज्ञानिक सुबूत नहीं है।

पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष का खुद मानना है कि याचिकाकर्ताओं ने सप्तऋषि बिल्डिंग में मौजूद अन्य समुदाय के मुकेश, नारायण, अरविंद कुमार और उनके परिवार के सदस्यों को उनकी जान बचाने के लिए जाने दिया। ऐसे में अगर वे सांप्रदायिक दंगे में शामिल थे और दूसरे समुदाय के लोगों को नुकसान पहुंचाना चाहते थे तो फिर उन्होंने उक्त लोगों को जाने क्यों दिया।

पीठ ने कहा जमानत याचिका के जवाब में जांच एजेंसी ने कहा है कि मृतक शाहिद को गोली मारने वाला मुख्य आरोपित अब तक गिरफ्तार नहीं हुआ है और न ही याचियों के पास से कोई भी हथियार बरामद हुआ है। अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष के अनुसार मोहन नर्सिग होम अस्पताल और सप्तऋषि बिल्डिंग दोनों तरफ से पथराव और गोलियां चल रही थीं, जबकि अदालत में पेश किए गए वीडियो में गोलियां सिर्फ मोहन नर्सिग होम से चल रहीं थीं।

अभी तक कई ऐसे मामले सामने आये हैं, जिसमें दिल्ली दंगों की जांच में पुलिस का एकतरफा रवैया उभर कर इस सुरक्षा बल की दंगों में सीधी भागीदारी के आरोपों को पुष्ट करता रहा हैं। ३० मई २०२० पटियाला हाउस अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेन्द्र राणा ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हिंसा मामले में आरोपी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा के केस की सुनवाई करते हुए पुलिस की जांच पर यह सवाल खड़े किए। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी यह भी नहीं बता सका कि अब तक केस में दूसरे पक्ष के संबंध में क्या जांच हुई है।

07 नवंबर २०२० को एडिशनल सेशन जज विनोद यादव ने कहा कि खालिद सैफी के खिलाफ महत्वहीन सामग्री के आधार पर तैयार की गई चार्जशीट में दिल्ली पुलिस ने कोई दिमाग नहीं लगाया बल्कि बदले की भावना से काम किया। उन्हें इस मामले में जमानत दे दी गयी।

दिनांक 20 जून, 2020: दिल्ली की एक अदालत में फ़ैसल को जमानत देने वाले जज विनोद यादव ने कहा कि इस मामले के गवाहों के बयानों में अंतर है और मामले में नियुक्त जांच अधिकारी ने ख़ामियों को पूरा करने के लिए पूरक बयान दर्ज कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘जांच अधिकारी ने इन लोगों में से किसी से भी बात नहीं की और सिर्फ़ आरोपों के अलावा कोई भी ठोस सबूत नहीं है, जिसके दम पर यह साबित किया जा सके कि फ़ैसल ने इन लोगों से दिल्ली दंगों के बारे में बात की थी।’

विदित हो राजधानी पब्लिक स्कूल जो कि दिल्ली के दंगों में पूरी तरह आग के हवाले कर दिया गया था, लेकिन उसके संचालक फैसल फारूक को पुलिस ने दंगों का मुख्य सूत्रधार, षड्यंत्रकर्ता और आयोजक बना कर 8 मार्च को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। पुलिस ने यह भी दावा किया था कि फ़ारूक़ के कहने पर ही दंगाइयों ने राजधानी स्कूल के बगल में स्थित डीआरपी कॉन्वेन्ट स्कूल, पार्किंग की दो जगहों और अनिल स्वीट्स में भी सोच-समझकर तोड़फोड़ की थी।

29 मई 2020: दिल्ली हाई कोर्ट ने फिराज खान नामक एक अभियुक्त को जमानत देते हुए पुलिस से पूछा कि आपकी प्रथम सूचना रिपोर्ट में तो 250 से 300 की गैरकानूनी भीड का उल्लेख है। आपने उसमें से केवल फिरोज व एक अन्य अभियुक्त को ही कैसे पहचाना? पुलिस के पास इसका जवाब नहीं था और फिरोज को जमानत दे दी गई।

27 मई 2020: दिल्ली पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने साकेत कोर्ट में जज धर्मेन्द्र राणा के सामने जामिया के छात्र आसिफ इकबाल तनहा पेश किया गया था। इस मामले में भी आसिफ को न्यायिक हिरासत में भेजते हुए जज ने कहा कि दिल्ली दंगों की जांच दिशाहीन है। मामले की विवेचन एकतरफा है। कोर्ट ने पुलिस उपायुक्त को भी निर्देश दिया कि वे इस जांच का अवलोकन करें।

25 मई 2020: पिंजड़ा तोड़ संगठन की नताशा और देवांगना को जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के सामने प्रदर्शन करने के आरोप में गिरफ्तार किया। अदालत ने कहा कि उन्होंने प्रदर्शन करने का कोई गुनाह नहीं किया, इसलिए उन्हें जमानत दी जाती है। यही नहीं अदालत ने धारा धारा 353 लगाने को भी अनुचित माना। अदालत ने कहा कि अभियुक्त केवल प्रदर्शन कर रहे थे। उनका इरादा किसी सरकारी कर्मचारी को आपराधिक तरीके से उनका काम रोकने का नहीं था। इसलिए धारा 353 स्वीकार्य नहीं है।

दिल्ली पुलिस की जांच तब और संदिग्घ हो गई जब केस नंबर 65/20 अंकित शर्मा हत्या और केस नंबर 101/20 खजूरी खास की चार्जशीट में कहा गया कि 8 जनवरी को शाहीन बाग में ताहिर हुसैन की मुलाकात खालिद सैफी ने उमर खलिद से करवाई और तय किया गया कि अमेरिका के राष्ट्रपति के आने पर दंगा करेंगे। हकीकत तो यह है कि 12 जनवरी 2020 तक किसी को पता ही नहीं था कि ट्रंप को भारत आना है और 12 जनवरी को भी एक संभावना व्यक्त की गई थी जिसमें तारीख या महीने का जिक्र था ही नहीं।

नताशा देवनगा के मामले में सी0सी0 टीवी फुटेज ना पेश करने की बात हो या आसिफ इकबाल तनहा की जामिया हिंसा में जमानत- पुलिस ने दिल्ली दंगों की जो कहानी बनायी वह खोखली है, तथ्यहीन है लेकिन यू0ए0पी0ए0 की आड में लोगों को लम्बे समय तक जेल में रख कर पुलिस भेदभाव कर रही है , यह भी जान लें कि कई मामलों में अदालत पुलिस को इस बात के लिए फटकार लगा चुकी है कि वह सिलेक्टिव और आधी अधूरी खबर मिडिया में लीक कर अभियुक्तों की छबि खराब कर रहा है। लेकिन पुलिस पर इस टिप्पणी का कोई असर नहीं दीख रहा है। आखिरकार क्या इसके आगे कोर्ट की शक्ति क्षीण हो जाती है।

गिरीश मालवीय

जगदीश्वर चतुर्वेदी की फेसबुक वॉल से साभार

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