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Panchtantra ki kahani

PanchTantra की कहानी-King & Damanak भाग-17

Damanak ने सच्चे सेवक की सेवा शर्तों में यह भी जोड़ दिया कि उसे न तो काम के समय भूख लगनी चाहिए, न प्यास, न सर्दी, न गर्मी, न थकान, न नींद। भूख प्यास लागै नहीं नींद जाको आय। शीत ताप व्यापैं नहीं, वह सेवक फल पाय। या तो वह इतने प्राचीन काल में…

PanchTantra की कहानी-बेकार का पचड़ा-भाग-10

पंचतंत्र के बेकार का पचड़ा भाग-9 में आपने पढ़ा कि …….. दमनक समझाता जा रहा था, जो व्यक्ति राजा को आफत में पड़ा देखकर भी उसकी अनसुनी नहीं करता है और उसके हुक्म पहले की तरह बिना किसी चूक और हीला-हवाली के बजाता रहता है, वही राजा का चहेता हो…

PanchTantra-टका नहीं तो टकटका भाग-1

पिछले अंक, PanchTantra-टका नहीं तो टकटका में आपने पढ़ा कि.......... धन दौलत के खूब बढ़ जाने के बाद आदमी के जो काम जहां हैं वहीं उसी तरह सधते चले जाते हैं। जैसे पहाड़ों की ऊंचाई या संपन्नता के कारण जलधाराएं अपने आप फूट निकलती हैं।.......…

PanchTantra-टका नहीं तो टकटका

महिलारोप्य नामक जिस नगर में अमरशक्ति नाम का राजा राज करता था और जिसमें विष्णुशर्मा अपनी पाठशाला चलाते थे वह वह महिलारोप्य नामक नगर से उतना ही दूर था जितना दिल्ली,दिल्ली से दूर है। महिलारोप्य नगर में बैठे हुए, महिलारोप्य नगर के राजा के…

PanchTantra-कान भरने की कला भाग-16

पिछले अंक के भाग-15 में आपने पढ़ा कि…………… उसके मंत्रियों के अचरज का भी ठिकाना नहीं था। राजा अपने लड़कों को उस ब्राह्मण को सौंप कर इस ओर से पूरी तरह निश्चित हो गया। इससे आगे भाग-16 में पढ़िए………कि.. न सही छह महीने साल दो साल ही सही, वह पंडित…

PanchTantra-कान भरने की कला भाग-11

पिछले अंक के भाग-10 में आपने पढ़ा कि…………… सचिवों को यह बात मालूम थी। राजकुमार जैसे थे वैसा बनाने में उनमें से कुछ का सहयोग भी था। वे चाहते थे कि राजा उनमें से जो भी बने पर राजा बनने के बाद वह सारा काम उनके ही ऊपर छोड़ कर वह नाच-तमाशा…

PanchTantra-कान भरने की कला भाग-10

पिछले अंक के भाग-9 में आपने पढ़ा कि…………… कहने का मतलब यह है कि लड़के लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर थे। उनका मन शैतानी में अधिक लगता था। वे पढऩे की जगह अपने शिक्षकों को ही पाठ पढ़ाने और बनाने लगते। गुरुजी डांटते-डपटते तो उनकी छुट्टी करा देते। ......…

PanchTantra-कान भरने की कला भाग-9

पिछले अंक के भाग-8 में आपने पढ़ा कि…………… कुछ समय तक अपने गुणों की तालिकाओं को बार-बार सुनते रहने के बाद वे यह मानने को तैयार हो जाते हैं कि अपने को गुणों, मानी, कवि और विद्वान कहने वाले गुणी और मानी इसलिए हैं कि उन्होंने राजा के उन गुणों…

पंचतन्त्र-कान भरने की कला भाग-8

पिछले अंक के भाग-7 में आपने पढ़ा कि…………… बरगद के नीचे की घास सूख जाती है और काई के ऊपर बीट में से भी बरगद निकल आता है। इससे आगे भाग-8 में पढ़िए.........कि........... जो लायक निकलते हैं वे गद्दी हथियाने की कला में नालायक लड़कों का सामना…

कान भरने की कला-कहानी की कहानी पंचतन्त्र-7

पिछले अंक के भाग-6 में आपने पढ़ा कि…………… पर यह इतना समय साध्य काम था जिसकी अनुमति न तो मेरी भावी योजनाएं देती थीं। न ही प्रकाशन संस्थान दे सकता था। यह पुनर्रचना पाठकों को कितना संतोष दे पाती है यह नहीं जानता पर मेरी अपनी अतृप्ति तो बनी ही…