PanchTantra-कान भरने की कला भाग-11

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पिछले अंक के भाग-10 में आपने पढ़ा कि……………

सचिवों को यह बात मालूम थी। राजकुमार जैसे थे वैसा बनाने में उनमें से कुछ का सहयोग भी था। वे चाहते थे कि राजा उनमें से जो भी बने पर राजा बनने के बाद वह सारा काम उनके ही ऊपर छोड़ कर वह नाच-तमाशा देखता, शराब पीता, रंगरेलियां मनाता और जब तक कुछ उल्टे सीधे हुक्म देता एक ओर पड़ा रहे।

इससे आगे भाग-11 में पढ़िए………कि…..

अक्ल के मामले में वह इतना कोरा रहे कि उनके इशारे पर ही चले। लड़कों के चौपट होने का उन्हें उतना दुख नहीं था जितना राजा को था। कारण यह था कि लड़के उससे कुछ अधिक मूर्ख रह गए थे जितना वे बनाए रखना चाहते थे।

अपने अनुभव से वे भी जानते थे कि निपट मूर्ख राजाओं को सिखा पढ़ा कर रास्ते पर लाना उतना ही कठिन होता है जितना चतुर सुजान राजा को अपने अनुसार चला पाना। इसलिए उन्होंने एक साथ और एक जैसे भारी सिर हिला कर यह जताया कि यह बात उन्हें मालूम है।

राजा बोला, इन राजकुमारों का जो हाल है उसे देख कर मेरा मन राज-पाट में लगता ही नहीं है। यह इतना बड़ा राज्य मुझे ही काटने को दौड़ता है।

इसके बाद राजा ने सूक्तियों में विलाप करना शुरु कर दिया। वह कहने लगा, निरबंस अच्छा पर कुबंस नहीं अच्छा। लड़का पैदा न हो तो संसार सूना दिखाई देता है। पैदा हो कर मर जाए तो आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है।

पर लड़का मूर्ख निकल जाए तब जितना कष्ट होता है उसके सामने ये दोनों दुख किसी गिनती में नहीं आते। संतान न होने का दुख कभी-कभी सालता है। संतान की मौत का दुख कुछ समय बाद भूल जाया जाता है। पर लड़का जपाट निकल जाए तो उसका दाह जीवन भर बना रहता है।

अजात मृत मूर्खाभ्यां मृतजातौ सुतौ वरम्।
यत: तौ स्वल्पदुखाय यावज्जीवं जड़ो दहेत्।।

सभासदों को हामी में उदास होते देख कर उसने आगे कहा, नालायक बच्चा पैदा होने से तो अच्छा है कि बच्चा पैदा होने से पहले ही गर्भपात हो जाए। अच्छा है कि मनुष्य ऋतुकाल में ऐसा कात ही न करे जिससे बच्चे पैदा होते हैं।

अच्छा हो बच्चा मरा हुआ पैदा हो। अच्छा है कि लड़के की जगह लड़की पैदा हो। अच्छा है कि पत्नी वंध्या हो। अच्छा है कि उसे गर्भ ही न ठहरे। पर ऐसा कभी न हो कि लड़का पैदा हो और लंठ निकले।

वह कितना भी सुंदर हो, कितना भी कमाऊ निकले, कितना भी गुणी हो जाए, पर लड़का ज्ञानी नहीं हुआ तो उसका होना न होना बराबर है।

……….इससे आगे भाग-12 में पढ़िए…