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PanchTantra की कहानी-King-Pinglak भाग-13

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पंचतंत्र के बेकार का पचड़ा भाग-12 में आपने पढ़ा कि ……..

जब करटक ने भी हामी भर दी, दमनक उसे प्रणाम करके King-Pinglak की ओर चला। दमनक को अपनी ओर आते देख कर King-Pinglak ने द्वारपाल को आदेश दिया, मेरे पुराने मंत्री के पुत्र दमनक आ रहे हैं। इनके आने पर किसी तरह की रोक-टोक नहीं होनी चाहिए, इसलिए अपनी बेंत की छड़ी पीछे हटा लो। उन्हें दूसरी पंक्ति में बैठना होगा।

अब इससे आगे पढ़िए, भाग-13 …………

द्वारपाल ने सिर झुका कर King-Pinglak से कहा, जैसी महाराज की आज्ञा।

दमनक ने प्रवेश करने के बाद King-Pinglak को झुक कर प्रणाम किया। King-Pinglak ने भी उसके सिर पर अपने पैने और मजबूत नखों वाले वाले दाहिने हाथ को रख कर आशीष दिया। जब दमनक बताए हुए स्थान पर बैठ गया तो King-Pinglak ने आदर सहित कहा, कुशल मंगल तो है? बहुत दिनों बाद दिखाई पड़े। कैसे आना हुआ?

दमनक बोला, महाराज अपनी ओर से तो कभी याद किया नहीं। मुझे ही कुछ सूझा तो अर्ज करने चला आया। सोचा, King-Pinglak के यहां तो बड़े, छोटे और मझोले-सभी की जरूरत रहती है। हो सकता है मैं भी किसी काम आ जाऊं।

कहते हैं राजाओं को कान खुजलाने या दांत खोदने के लिए एक तिनके तक की जरुरत पड़ती है फिर वाणी और हाथ पांव युक्त प्राणी की तो बात ही नहीं कहनी।

महाराज, हमलोग तो आपके खानदानी सेवक ठहरे। आपके अच्छे-बुरे सभी दिनों में आप का साथ
निभाने वाले हैं। आपने मुझे मेरा अधिकार नहीं दिया तो कोई बात नहीं, पर आप हमें इस तरह बिसरा देंगे, यह नहीं सोचा था।

नीति तो यह कहती है कि राजा को अपने सेवकों को उनके अनुरुप पद पर ही रखना चाहिए। यह सोच कर कि मैं तो सबका स्वामी ठहरा, मुझे कौन रोकने-टोकने वाला है। कोई चूड़ामणि को सिर के स्थान की बजाय पांव में तो नहीं पहन लेता।

कहा तो यह भी गया है कि चाहे राजा कितने भी संपन्न हो, कितना भी कुलीन हो और चाहे उसे राजा का पद अपनी वंश-परंपरा से ही क्यों न मिला हो, यदि राजा गुण की परख नहीं कर पाता है या जानते हुए उसकी अनदेखी करता है तो उसका साथ उसके सेवक भी नहीं देते हैं। जब तक साथ रहते भी हैं तो मनमानी करते रहते हैं।

इसके आगे भाग—14 में पढ़ियेग़ा……….

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