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कायस्थ आन्दोलन के एक महारथी का प्रयाण

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परिवार के साथ दीपावली की पूजा कर भोजनोपरांत सोया ही था कि लगभग मध्यरात्रि के बाद फोन की घंटी बजने से नींद टूट गयी। फोन पर मेरे पचास वर्ष पुराने मित्र और कांग्रेस के बड़े नेता, भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय जी थे। मैंने उन्हें दीपावली की शुभकामना दी और पूछा- “तुम इतनी देर रात को कहां से फोन कर रहे हो?” तब उन्होंने बताया, “अरे भाई! मैं अभी मुम्बई में हूँ और तुम्हें एक दुखद समाचार देना है कि आज शाम मुम्बई के ही एक अस्पताल में माननीय कैलाश नारायण सारंग जी की मृत्यु हो गयी है।” मैं तो यह सुनकर स्तब्ध रह गया। लेकिन, इतनी रात को उनके बेटे को फोन करना उचित नहीं समझा तो दीपावली के दूसरे दिन सुबह में उनके पुत्र को फोन कर अपना शोक सन्देश प्रेषित किया।

श्री कैलाश नारायण सारंग जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी एक अद्भूत व्यक्तित्व थे। एक अत्यंत ही मेहनती और कर्मठ, समाजसेवी तथा कुशल राजनेता के रूप में उन्हें सदैव याद किया जायेगा।

मध्य प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा भी कालखंड था, जब पूरे मध्य प्रदेश में भाजपा के सर्वेसर्वा के रूप में एक “तिकड़ी” की चर्चा जोरशोर से होती थी। इस “तिकड़ी” में मध्य प्रदेश भाजपा के तीन बड़े नेता शामिल थे। पहले तो कुशाभाऊ ठाकरे जी थे, जो मध्य प्रदेश के तत्कालीन संगठन मंत्री थे। बाद में भाजपा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हुए। दूसरे व्यक्ति थे सुन्दर लाल पटवा जो बाद में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। ये दोनों महानुभाव तो पहले ही स्वर्गवासी हो गये हैं। तीसरे व्यक्ति थे श्री कैलाश नारायण सारंग जी जिनका दीपावली की रात देहांत हो गया। इस प्रकार एक स्वर्णीम अध्याय का अंत हो गया।

कैलाश नारायण सारंग जी के साथ मुझे पार्टी में कई बार साथ काम करने का सौभाग्य मिला था। एक बार 1998 के आम चुनाव के दौरान हम दोनों ही केन्द्रीय कार्यालय, दिल्ली के कंट्रोल रूम को देख रहे थे। उस समय पीयूष गोयल जी भी हमलोगों के साथ थे। हम तीनों ही अपने-अपने राज्यों में यह काम पहले से करते रहे थे। मध्य प्रदेश की राजनीति से मेरा यो सीधा सम्बन्ध तो नहीं रहा। मैं बिहार में प्रदेश उपाध्यक्ष और चुनाव संचालन कार्य में लगा रहा और सारंग जी मध्य प्रदेश में सक्रिय रहे।

फिर भी कभी-कभार दिल्ली के केन्द्रीय कार्यालय में आडवाणी जी, जोशी जी या कुशाभाऊ के यहाँ या वार्षिक अधिवेशनों में मुलाकात हो जाती थी। वे भी कायस्थ महासभा से जुड़े रहे और मैं भी कायस्थ महासभा में सक्रिय था। मैं कायस्थ रत्न कृष्ण नंदन सहाय जी के प्रिय पात्रों में एक था। हालाँकि वे कांग्रेस के नेता थे और मैं भाजपा का समर्पित कार्यकर्त्ता। पर सामाजिक कार्यों में साथ मिलकर ही कार्य करते थे।

मुझे स्वर्गीय कृष्ण नन्दन सहाय जी ही अपने साथ अभाकाम वाराणसी अधिवेशन में ले गये थे, जिसमें कैलाश नारायण सारंग जी उनके आशीर्वाद से ही अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के अध्यक्ष बने। यह संयोग ही कहा जायेगा कि उस अधिवेशन में भाई सुबोधकांत सहाय जी को मुख्य अतिथि के रूप में आयोजित किया गया था। उसके बाद से मा0 कैलाश नारायण सारंग जी का पटना आना-जाना नियमित रूप से लगा रहा। वे अक्सर कृष्ण नंदन सहाय जी के आवास “सहाय सदन” में रुकते थे। अगर सहाय जी पटना में नहीं होते, तो वे मेरे आवास “अन्नपूर्णा-भवन” में रुकते, लेकिन हम दोनों दिनभर साथ ही रहते।

एक बार की एक रोचक घटना का स्मरण हो रहा है। 1996 की बात है। पटना के रवीन्द्र भवन में अखिल भारतीय कायस्थ महासभा का अधिवेशन आयोजित था। उसी दिन शाम को मुजफ्फरपुर में भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक का समापन भी था, जिसके लिए पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी आने वाले थे। प्रदेश उपाध्यक्ष के नाते अटल जी को सुबह राजधानी एक्सप्रेस से रिसीव करके शाम में मुजफ्फरपुर ले जाने की और वापस पटना आकर पुनः राजधानी एक्सप्रेस में वापस दिल्ली के लिये बैठाने की जिम्मेवारी मेरी ही थी।

मैं पहले ही दिन कार्यसमिति की बैठक समाप्त होने के बाद रात को पटना चला आया था। कृष्ण नन्दन सहाय जी का फोन आया कि अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के अधिवेशन की वजह से सहाय सदन में भीड़ रहेगी इसलिये तुम कैलाश नारायण सारंग जी को अपने आवास पर ठहरा लो। मेरे पास दिल्ली से अटल जी का जो कार्यक्रम आया था उसके अनुसार अटल बिहारी वाजपेयी जी वैसे तो भले ही तेरह दिन ही प्रधानमंत्री रहे थे, स्टेट गेस्ट हाउस में ठहराये जाने की व्यवस्था की जानी थी।

मैंने सहाय जी को कैलाश नारायण सारंग जी को अपने यहां ठहराने के लिए तुरंत हामी भर दी। बाद में अटल जी के निजी सचिव शिव कुमार जी का फोन आया कि अटल जी इस बात से नाराज हो रहे हैं कि अटल उनको गेस्ट हाउस में ठहराया जायेगा। उन्होंने कहा, “लो, अटल जी से बात कर लो।” अटल जी ने मुझे डांटते हुये कहा कि “क्या तुम्हारे आवास में मेरे ठहरने के लिए दो-तीन कमरे भी उपलब्ध नहीं है?

एक में मैं रहूँ और एक में एस0पी0जी0 के अधिकारी” उन्होंने कहा की “मैं तुम्हारे यहाँ ही ठहरूंगा। रंजन जी भी आ सकते हैं। (उनकी गोद ली हुई पुत्री के पति रंजन भट्टाचार्य) अत: तीन कमरे तैयार रखना।” यह कहकर अटल जी ने फोन रख दिया। अब अटल जी के आदेश का पालन तो करना ही था।

एक दिन पहले ही कैलाश नारायण सारंग जी आ गये। उनको मैंने ग्राउंड फ्लोर के एक कमरे में ठहरा दिया। सौभाग्य से ऋतुराज और रिवोली अपने-अपने होस्टलों में थे, जिससे उनके कमरे खाली थे। अत: अटल जी को मैंने अपने कमरे में ठहराने और रंजन भट्टाचार्य और एस0पी0जी0 अधिकारी प्रमोद अस्थाना जी (जो अभी-अभी मणिपुर के पुलिस महानिदेशक के पद से सेवानिवृत हुए हैं) को उन दोनों कमरों में ठहराने की व्यवस्था कर दी। अटल जी को सुबह 5 बजे राजधानी एक्सप्रेस से रिसीव कर अपने आवास ले आया।

सुबह नहा-धोकर लगभग 9 बजे हम जब हम नास्ते के टेबुल पर बैठे थे तो कैलाश सारंग जी को सीढियों से ऊपर आता देखकर अटल जी ने कहा कि “ सूरमा भोपाली को कहां से बुला लिया है? मैंने कहा कि पटना में अखिल भारतीय कायस्थ महासभा का जो अधिवेशन चल रहा है, उसी में भाग लेने के लिए कृष्ण नन्दन सहाय जी ने इन्हें बुलाया है और ये हमारे यहां ही ठहरे हैं। नास्ते के टेबुल पर अटल जी ने बहुत ही विनोदपूर्ण वातावरण में मध्य प्रदेश राजनीति की बातें की। टेबुल पर हुई वार्तालाप को बताने से तो विषय लम्बा हो जायेगा। फिर कभी।

स्व0 कैलाश नारायण सारंग जी एक वाकपटु, विनोदपूर्ण और सहृदय व्यक्ति थे। जिनसे उनकी पटती थी, बहुत ही बढ़िया पटती थी। आज वे स्वर्गलोक वासी हो गये हैं। किन्तु, उनकी स्मृतियां तो हमेशा ताजी ही रहेंगी और उनका मुस्कुराता हुआ चेहरा हर वक्त आंखों के सामने रहेगा। भाजपा परिवार और देश के कायस्थ समाज के लिये उनका महाप्रयाण एक अपूरणीय क्षति है। ईश्वर कैलाश नारायण सारंग जी की पवित्र आत्मा को चिर शान्ति प्रदान करें और उनके परिवारजनों को इस दुख की घड़ी को धैर्यपूर्वक झेलने के लिए प्रर्याप्त संबल प्रदान करें।

संस्मरण

(आर0 के0 सिन्हा)
संस्थापक सदस्य भाजपा एवं
पूर्व सांसद, राज्य सभा

 

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