किसान तो बना ही है आत्महत्या के लिए

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कुछ माह पहले दक्षिण के किसान दिल्ली के जंतर-मंतर पर थे। उन्होंने कर्ज से आजिज आकर सूखे की गिरफ्त के बाद चूहा, सांप खाकर, पेशाब पीने का लोकतांत्रिक गुनाह किया था। खूब आलोचना भी झेली और एनजीओ पेड इवेंट का आरोप भी लिया।

उनका आंदोलन राजनीति के भेंट चढ़ा दिया गया। सत्तापक्ष ने कहा विपक्ष की साजिश है। ये किसान तो फाइव स्टार होटल से खाना खा रहे थे और मिनरल वाटर पी रहे थे, जिसका उनके पास कोई हक नहीं है। इन सब चीजों को खाने का हक सिर्फ और सिर्फ नेताओं,उद्योगपतियों और जगलरों को ही है।

इधर ये तस्वीर सोशल मीडिया से मिली है। तमिलनाडु के तिरुनेबेली जिले के किसान ने स्वयं सहित पत्नी और बच्ची के ऊपर पेट्रोल डालकर आग लगाकर आत्मदाह किया। तीन लोगों की मौत हो गयी।

इनकी मौत का कारण था कर्ज का रुपया चुका देने के बावजूद भी, साहूकार के माध्यम से उसे और उसके परिवार को परेशान किया जाना। 1 लाख 40 हजार के कर्ज के लिए 2 लाख से अधिक रुपया वो दे चुका था। लेकिन साहूकार उससे और ज्यादा पैसा मांगता था।
ये लोग कहॉं आयेंगे, यदि इन्हें आना ही होता या कुछ करना ही होता तो क्या ऐसे हादसे सम्भव हैं। क्या साहूकार बगैर प्रशासन की मिलीभगत के गॉंवों में साहूकारी कर रहे हैं। दो सौ से तीन सौ प्रतिशत तक की वसूली कैसे सम्भव हो सकती है।
झारखण्ड की संतोषी की ही तरह बे-आधार तमिलनाडु में भी इस किसान परिवार की मदद करने न तो सिस्टम आया न सरकारी अमला।
हां जलने के बाद कुछ पुलिस वाले पानी डालने और पत्रकार कैमरा लिए फोटो सेशन पूरा करने जरूर आये।

अपने हाथ से परिवार को खत्म करते इस किसान ने दक्षिण के साथ देशभर में वाजिब किसानों की वास्तविक सूरत को बतलाया है।

ऐसे चित्र, ऐसी व्यवस्था, ऐसी संवेदनहीनता, ऐसा दुर्भाग्य भारत में ही देखने को मिल सकता है। हम जिस समाज में जी रहे हैं, उसे किसी भी दशा में स्वस्थ्य समाज की संज्ञा नहीं दी जा सकती। यहॉंं का जनमानस नपुंसक हो गया है। संवेदनशीलता नाम की कोई चीज नहीं बची है। अपने फायदे के लिए कोई कुछ भी बेचने को तैयार है। इसमें भी सबसे पहले वह देश को ही बेचने को तत्पर है।

तुर्रा ये कि सरकारें किसानों का कर्ज माफ कर रही हैं। देश भर में सारा कुछ आनलाइन होने और आधार से जुड़ने के बाद भी बैंक वाले, तहसील वाले, तहसीलदार, एस0डी0एम0, सब मिलकर लूटने में लगे हैं। जिसको जहॉं जो मिल रहा है, तबीयत से लूट रहा है।

ये भारत ही है जहॉं किसानों की फसल का समर्थन मूल्य सरकार तय करती है, लेकिन उससे बनने वाले प्रोडक्ट का मूल्य उद्योगपति तय करता है, सरकार के मौन समर्थन से। गेहूं का समर्थन मूल्य सरकार तय करती है, लेकिन आटे का, ब्रेड का, रोटी का, नान का, चपाती का अधिकतम मूल्य वह तय करने की हैसियत में ही नहीं है। एक किलो आटा अधिकतम बीस रूपये में बैठता है। लेकिन उससे बनने वाली ब्रेड साठ रूपये, चपाती पांच रूपये से चालीस और पचास रूपये। तन्दूरी और नान का तो रेट ही नहीं है। जिसके जो मन आये बेचे।

क्या किसी न्यूज चैनल में ये खबर देखी गई ? यदि हां तो लिंक दीजियेगा। अगर नहीं तो ये जो तस्वीरखींच रहे हैं, इनके खिलाफ कार्रवाई तो बनती हीे है। मरी आत्मा और मरी संवेदना के जीते-जागते और कैमरा लिए हाड-मांस के ये पुतले तो कतई जिन्दा रहने लायक नहीं। पता नहीं ये घर जाकर कैसे खाना खाते हैं। कैसे बाल-बच्चों के साथ जी पाते हैंं।

समाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर दीक्षित की फेसबुक वाल से…..

विशेष रूप से सम्पादित:

बीते सप्ताह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ किसानों को कर्ज माफी के प्रमाणपत्र देने महोबा पहुंचे। उनके महोबा पहुंचने के कुछ घंटे पहले ही यहां एक किसान ने कर्ज से परेशान हो आत्मदाह कर लिया। सूबे की बीजेपी सरकार किसानों को ऋण मोचन प्रमाणपत्र बांट रही है और दिल्ली मेट्रो से लेकर तमाम अखबारों में फुलपेज विज्ञापन देकर फूले नहीं समा रही, लेकिन विडंबना यह है किसान अभी भी आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं।

कोतवाली क्षेत्र के कैमाहा गांव में शनिवार रात किसान मिजाजी अहिरवार (42) ने घर पर कमरे का दरवाजा बंद करके अपने ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगी ली। उस समय उसकी पत्नी सुनीता जानवरों को चारा डालने गई थी। सुनीता ने बताया कि जब वह वापस आई, तो अंदर आग की लपटें देख चिल्लाई और मदद के लिए गुहार लगाई। उसके चिल्लाने की आवाज सुनकर लोग दौड़े। लोगों ने दरवाजा तोड़कर मिजाजी को बाहर निकाला, लेकिन तब तक उसकी सांस थम चुकी थी।
सुनीता ने बताया कि उसके पति ने वर्ष 2005 में बैंक से कर्ज लेकर ट्रैक्टर खरीदा था। उसके पास मात्र साढ़े तीन बीघा जमीन है, उस पर भी हर साल उपज खराब होती रही और वह कर्ज चुका पाने में नाकाम रहा। एक वर्ष पहले भारतीय स्टेट बैंक की जैतपुर शाखा ने उसे नोटिस दिया था।

इलाहाबाद यूपी ग्रामीण बैंक श्रीनगर से बकरी के लिए साठ हजार का कर्ज भी उसने लिया था। उस पर 6 लाख रुपये का कर्ज था। परिजनों ने आरोप लगाया कि लेखपाल ने सूखा राहत में उसका नाम नहीं डाला।

कहने पर उसने रुपये की मांगे। एक हजार उधार लेकर लेखपाल को दिए गए फिर भी उसे कोई लाभ नहीं मिला। कर्ज माफी के लिए भी वह जिला प्रशासन के चक्कर काट रहा था लेकिन उसे निराशा हाथ लगी।
क्या ऐसी बैंकों के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी। शायद नहीं क्योंकि बैंकें, राज्य सरकार के कन्ट्रोल में नहीं। लेकिन लेखपाल तो राज्य सरकार के कन्ट्रोल में है। उसे तो गिरफ्तार किया ही जा सकता है और उसके खिलाफ तो प्रिवेंशन आॅफ करप्शन एक्ट के तहत कार्रवाई अत्यंत आवश्यक है।