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ढिढ़ोरा पीटा जाता है कि देश में हर साल 64,000 करोड़ रुपयों की बिजली चोरी हो रही है। ये हल्ला इसलिए मचाया जाता है कि छोटे कन्ज्यूमर, झुग्गी-झोंपड़ी एवं स्लम में रहने वाले करोड़ों लोगों ​के सिर पर ये ठीकरा फोड़कर आसानी से उसी मतदाता को यह दिखाया जा सके कि सबसे बड़ी चोर जनता ही है।

KESCO
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जबकि वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है। दरअसल बिजली की बड़े पैमाने पर चोरी करने वाले हैं, बड़े-बड़े औद्योगिक घराने, फर्जी रूप से फैक्ट्री चलाने वाले, छोटी-छोटी आइसक्रीम/बर्फ की फैक्ट्री चलाने वाले। और इन सबमें इनके बाप हैं, बिजली महकमे के एस0डी0ओ0 और इनसे बड़े अभियन्ता (Engineers)  जो लाइनलॉस के नाम पर अरबों का चुना भी लगा लगे रहे हैं और चोरी भी करवा रहे हैं।

चोरी कहीं नहीं हो रही है। चोरी के नाम पर जनता को चोर बताया जा रहा है। जबकि एक बल्ब जलाने का 100 रूपया प्रतिमाह की उगाही बिजली Engineers उन झुग्गी-झोंपड़ी वालों से वसूलते हैं। एक बल्ब के सौ रूपये, एक पंखा चलाने का सौ रूपये, इस तरह से पूरी उगाही होती है। जिसे बाद में बिजली चोरी बताकर जनता को ही चोर ठहराया जा रहा है।

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