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PanchTantra की कहानी-King & Damanak भाग-15

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पंचतंत्र के बेकार का पचड़ा भाग-14 में आपने पढ़ा कि ……..

Damanak देख रहा था कि उससे कुछ बेअदबी हो रही है पर इस समय उसकी बात का असर हो रहा था। बात सूक्तियों के बहाने कही जा रही थी। King पिंगलक इसकी काट करता या इस पर चिढ़ता तो इससे उसकी मूर्खता साबित हो जाती।

अब इससे आगे पढ़िए, भाग-15 …………

इस समय Damanak नहीं बोल रहा था। राजा की उपेक्षा से उसे इतने दिनों तक जो अपमान झेलना पड़ा था उसी की पीड़ा बोल रही थी। Damanak एक ही बात को बार-बार अलग-अलग सुभाषितों के बहाने दुहराकर अपने मन को हल्का कर रहा था।

Damanak ने ऊपर से नम्रता दिखाते हुए कहा, महाराज जिस देश में मणियों के परीक्षक नहीं होते वहां मोतियों का मोल कौन समझेगा। नासमझ गंवारों के हाथ में यदि चंद्रकांत मणि पड़ जाए तो वे उसे तीन कौडिय़ों में बेचकर भी समझेंगे, कि उन्होंने खरीदार को लूट लिया।

Damanak एक ही बात को फिर दुहराने लगा, जहां कोई लोहित और पद्मराग-मणि के बीच फर्क करना ही नहीं जानता वहां कौन मूर्ख होगा जो रत्न बेचने जाएगा। होता यह है महाराज कि यदि राजा गुणी और अनाड़ी सेवक में अंतर नहीं करता है तो गुणी व्यक्तियों में कुछ करने का हौसला ही नहीं रह जाता।

न तो राजा के बिना सेवकों का काम चल सकता है न चाकरों के बिना राजा का। अत: दोनों को एक दूसरे का ध्यान रखना चाहिए। यही लोक का व्यवहार है। यदि मैं किसी कारण से नहीं आ सका तो आपने स्वयं बुलावा भेजा होता तो क्या मैं आने से इनकार कर सकता था?

महाराज, एक सेवक के नाते मेरा संबंध तो वैसा ही है जैसा अरों का पहिए की धुरी से होता है। अरों के बिना न तो पहिए का काम चल सकता है, न धुरी के बिना अरे अपने को टिकाए रह सकते हैं।

Damanak  ने बात तो पूरी कह दी थी पर मन का मलाल इतने पर भी मिटा नहीं था। उसकी आवाज तो धीमी और नरम थी पर Damanak जो कुछ कह रहा था उससे पिंगलक भीतर ही भीतर तिलमिला अवश्य रहा होगा।

इसके आगे भाग—16 में पढ़ियेग़ा……….

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